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Friday, October 9, 2020

शिकायत

मैं दिन भर चुपचाप मुस्कुराती हूँ 
बस रात में तकिये के कोने भिगोती हूँ 
इस बात की उन्हें मुझसे शिकायत है 

मैं उनकी महफ़िलों में खुलकर शामिल नहीं होती 
उनकी मस्खरियों पर अब खुल के ठहाका नहीं लगाती 
इस बात की उन्हें मुझसे शिकायत है 

रोटियां गिन कर बनती हैं घर में , 'बस केवल एक ?'
इस बात की उन्हें मुझसे शिकायत है

एक अरसा था जब मेरे घर देरी से आना 
इस बात की उन्हें मुझसे शिकायत थी 
आज मैं अपने कमरे में पूरा दिन बंद क्यूँ हूँ 
इस बात की उन्हें मुझसे शिकायत है

काम के लिए मेरा उतावलापन रोके न रुकता था 
आज मैं दफ्तर क्यूँ नहीं जाना चाहती 
इस बात की उन्हें मुझसे शिकायत है

दुनिया में हो रहे हर सही-गलत के लिए लड़ना मिज़ाज था मेरा 
आज हालातों से क्यूँ नहीं लड़ती 
इस बात की उन्हें मुझसे शिकायत है

कई मरतबा मेरे अल्फ़ाज़ों ने बहुत कुछ बयाँ  किया है 
आज क्या नया ढूंढ रहे हो नज़म में प्रिए  
मेरी खामोशियाँ क्यूँ सुनाई नहीं देती 
इस बात की मुझे उन सब से शिकायत है। 

Saturday, June 20, 2020

आपका आविष्कार 

मैं हूँ हर इमारत की बेजोड़ बुनियाद 
ईंट मेरी इकाई है और सीमेंट, पत्थर से हुई हूँ मैं ईजाद 
मानव जाती ने ही किया है मेरा आविष्कार 
अब तक मुझे पहचान ही लिया होगा - मेरा नाम है दीवार। 
मेरी अंदरूनी ताकत से हर इमारत की नींव परखी जाती है 
सूरज की बिखरी किरनों  में मेरी परछाई दूर-दूर तक जाती है 
मैं हूँ चीन में, बर्लिन में, कुम्भलगढ़ में और दुनिया के हर कोने में 
पानी को जो संचित करना है, मैं हूँ उस बांध के होने में 
किसी भी निर्माण की सीमा होती नहीं मेरे बिना 
मेरे नाम पर तो मशहूर सिनेमा भी है बना 
 मैं अक्सर चार बहनों के समूह में ही आती हूँ 
मेरे कान तेज़ हैं, बच के रहना, आपकी सारी बातें सुन पाती हूँ
मुझको पलस्तर कर और रंग भर आप लोग खूब सजाते हो 
खुद के मन को लुभाने के लिए सुन्दर तस्वीरें भी टँगाते हो 
मौसम के बदलते मिज़ाज़ को मैं अपने ढाल से हूँ रोके 
इन सभी का सही मात्रा में लुत्फ़ उठाने के लिए मैंने ही खुद में दिए हैं झरोके 
मैंने अपने भीतर कई अबलाओं के सपनों को दम तोड़ते है देखा
आज भी घर की कई सीताओं की मैं ही हूँ वो लक्ष्मण रेखा 
मैं घर, ज़मीन, जायदाद के लिए फ़ौरन ही खिंच जाती हूँ 
कोई भी दो लोगों में जब भेद करना हो तो मैं तुरंत ही बिछ जाती हूँ 
बात गर धर्म, जाति या देश की आये तो मैं बस खड़ी हो जाती हूँ 
आपकी हैसियत और अहम् से भी ज्यादा मैं उस वक़्त बड़ी हो जाती हूँ
मैं देख पाती हूँ सर्वत्र पर अफ़सोस है कि मैं हूँ मूक 
मेरे एक ओर पकवान बनते हैं और दूजी ओर कतारों में लगती है भूँक 
आप मुझे कितना भी कोसिये पर मैं अपना फ़र्ज़ सच्चाई से निभाती हूँ 
इस हिस्से की हकीकत उस हिस्से से बखूबी छुपाती हूँ 
मैं आपको महफूज़ रखूंगी चाहे धूप हो या बारिश 
इसके बदले आपसे करनी है एक छोटी सी गुज़ारिश 
मुझे अपने घर में बेशक शामिल करें पर अपने दिलों से रखें दूर 
मैं तो हूँ ही पत्थर दिल क्या करूँ, पर आप न हों मजबूर !!

Tuesday, April 28, 2020

नई दुनिया


पैसे और शौहरत की दौड़ न ख़त्म होने वाले सिलसिले हैं ,
शहर तो बड़े हो रहे हैं पर घर छोटे हो चले हैं। 
एक दिन अचानक ये सिलसिला कुछ बदला और छा गया जैसे कोई सन्नाटा .. 
घर से दूर भागने वाला हर इंसान झटपट अपने घर को लौटा। 
तेज भागती इस दुनिया के जैसे पहिये ही गए थम 
दूर दूर तक सैर करने वाले ये पाँव जैसे घर में ही गए जम 
समझ ही नहीं आ रहा था कि दुनिया किस बात पर कर रही है इतना मंथन 
खुशनुमा चल रही इस ज़िन्दगी में कहाँ से आ गया ये नया व्यथण 
इंटरनेट पर इस विपदा को जानने के लिए किया मैंने अपना शोध जारी 
कुछ ही क्षण में समझ आ गया ये चीज़ नहीं है मामूली : ये है एक भयानक महामारी 
दुनिया की तेज़ रफ़्तार पर लगा है जैसे कोई ब्रेक
यूं तो हमारे पचास अलग दुश्मन हैं पर इस बार सबका था एक 
इस दुश्मन के वार से फैली है स्थिति आपातकालीन 
अखबार, टेलीविज़न, हर तरफ का माहौल हो गया है ग़मगीन 
थिएटर, रेस्ट्रॉं, स्कूल सब पर अब ताला लटका है 
आप घर से न निकलें, इस लिए दफ्तर भी घर पर आ पहुंचा है 
इस विपदा के वक़्त वैसे तो नसीहत देने की नहीं है मेरी कोई बिसात 
फिर भी एक दोस्त के नाते कहती हूँ आपसे एक बात 
इस घडी में घर के दरवाजे ज़रूर बंद कीजिये पर दिल के दरवाजे खोलिये 
समय की दराज़ में जो किस्से पड़े हैं, उन्हें अपनों से बोलिये 
लीजिये चाय की चुस्कियां साथ में, रिश्तो में मिठास घोलिये 
देखिये घर पर कोई सिनेमा, उस नए गाने पर चाहे डोलिये 
निकालिये उस अलमारी से कोई अपनी कोई पुरानी किताब कुछ रंग उनमें भर लीजिये 
लगा लीजिये कोई नया पौधा या कोई नया व्यंजन इज़ाद कर लीजिये 
जाइये अपनी बालकनी में और देखिये तारों का टिमटिमाना और सुनिए चिड़ियों का चहकना 
पेड़ों में नए पत्तों का आगमन हुआ है, महसूस कीजिये फूलों का महकना 
खुशनसीब है हम जो, साथ में हमारे है परिवार और रहने को एक घर 
कुछ लोगों का जीवन इस आपदा में अफ़सोस हुआ है बाद से बदतर 
मुसीबत में फंसे लोगों के लिएब मदद का हाथ बढ़ाएं 
जो हो सके अपनी तरफ से मदद करने में न सकुचायें 
इस मुसीबत की घड़ी में समाज के कई सिपाही हमारी ढाल बन कर खड़े हैं 
इस बिमारी के लिए अपने परिवार को पीछे छोड़ वो रोज़ नई जंग लड़े हैं 
इस दुविधा की घडी में में आपसे बस इतना सा है कहना 
आपको इस जंग ले लिए बस अपने घर में है रहना 
मिलकर हिम्मत रखेंगे तो ज़रूर होगी इस बीमारी की हार 
याद रहे गर आज सर सलामत है तो कल पगड़ी होगी हज़ार !


Friday, August 23, 2019

उदासीनता (Indifference)

             

मैं सर झुका के चली जाती हूँ रोज़ उसी सड़क से 
उस सड़क पर कई गाड़ियां जाम में रोजाना फँसती हैं 
वाहन चालक एक दूसरे पर हार्न बजा कर अपने दिन और दिल दोनों की झल्लाहत निकालते हैं 
पर मुझे क्या फर्क पड़ता है, मेरा घर दफ्तर से पास ही है 
मुझे लेने कंपनी की बस आती है, मैं उसी में बैठी रहती हूँ , कान में रेडियो लगाए !

शहर के बीचों -बीच हाट लगता  है 
ताज़ी हरी सब्ज़ियां, रंगीन कपडे, चमकीले बर्तन, पूजा का सामान 
बेचने वाला पहले एक ऊंची बोली लगाता है.. 
फिर ग्राहक का मिज़ाज़ देखकर भाव सीढ़ी से उतारने लगता है 
मैं इस मोलभाव की बहस पर ख़ास गौर नहीं देती, मेरा सारा राशन बिग बास्केट से आता है  
मैं अपनी आँखों पर धूप का चश्मा चढ़ा लेती हूं, मुझे धूप सहन नहीं होती !

हर सुबह मेरे घर में अखबार आता है, फिर आज तो शनिवार है 
हर शनिवार चाय की चुस्की के साथ अखबार पढ़ना आदत है मेरी 
अखबार की सुर्ख़ियों कई लोगों की आपबीतियों से सुर्ख हैं  
भुखमरी, गरीबी, हिंसा, नफरत, जंग, साम्प्रदायिकता हर पहलू पर एक खबर ज़रूर छपी है 
घने जंगल जल रहे हैं, देश नफरत की आग में पिघल रहे हैं 
मैं अपने घरवालों  से  दूरभाष द्वारा संपर्क करती हूँ, उनका और मौसम का हालचाल लेती हूं 
फिर अपने घर की खिड़कियां बंद कर लेटी हूँ
A.C. चलाना पड़ता है करीब करीब पूरे साल, गरमी हर दिन बढ़ रही है !

अरे मैंने कल की बात तो आप लोगों को बताई ही नहीं 
मैंने कल घर के बहार अपने पडोसी को शाम को देखा 
उसने मुझे देख कर भी अनदेखा कर दिया .... न कोई मुस्कराहट, न दुआ- सलाम
 ये बड़े शहर के लोग भी बड़े मतलबी हो गए हैं 
बिना ज़रुरत के कोई सर उठाकर भी नहीं देखता, पर मुझे ये उदासीनता बिलकुल पसंद नहीं ! 

Thursday, February 7, 2019

यादें


एक वक़्त था जब हम साथ रहकर भी कभी नहीं थकते थे
जब भी मौका मिले बिना कुछ सोचे, जो मुँह में आये वो बकते थे
न शब्दों पे पर्दा था, न कोई थी विचारों में रुकावट
हँसी  हो या रुलाई उसमें औपचारिकताओं की नहीं थी दिखावट
आज का वक़्त बदला है ..
कल ही किसी पुराने दोस्त से बात करने को मन चाह रहा था
सीधे कॉल ही करते हैं दिल में था, पर दिमाग पहले अपॉइंटमेंट लेने को मना रहा था
बहुत सोचने के बाद, व्हाट्सएप्प पे एक छोटा सा पिंग कर दिया
उसने व्हाट्सएप्प का जवाब देने के लिए अगला दिन ही कर दिया
इनकी छोड़िये ..
कुछ दोस्त तो इतने तल्लीन हैं, उनके मैसेज का रिप्लाई भी नहीं आता
भूले-बिसरे आ भी जाये तो बात करने की इच्छा है, ऐसा इज़हार नहीं आता
आपने इन्हें याद करके फ़ोन किया होगा, फ़ोन नहीं  उठाया उस वक़्त ये समझ भी लें आप
लेकिन गलती से भी महीनों, सालों बाद भी कभी इनका कॉल-बैक नहीं आता
सोचा पहले बहुत आसान था :
सायकल की घंटी बजाते थे, दोस्त खेलने का इशारा समझ जाते थे..
कॉलेज के लास्ट पेपर  के बाद कौनसी पिक्चर देखेंगे, वो ग्रुप स्टडी के वक़्त ही तय कर जाते थे..
इन्हीं दोस्तों के साथ आपने कभी अपना टिफ़िन खाया होगा
इन्हीं के साथ सायकल पे कभी रेस लगाईं होगी
शायद इनके साथ बैठके कई अनकही, अनसुनी कहानियां और किस्से छुपाये होंगे
इनके साथ रात रात को बैठकर नोट्स किसी की नक़ल कर उतारे होंगे
लेकिन आज का वक़्त बदला है..
आज ये अपनी दुनिया में व्यस्त हैं
अपने आप में सभी मस्त हैं
वक़्त बदलता है तो ज़रूरतें भी बदलती हैं
आप की जगह कई और शख्सियत ले लेती हैं
पर इस भागती दुनिया में ज्यादा अपेक्षाओं के बंधन में न बाँधूँगी दोस्त
पर जब कभी अपनी तुम्हें लगे, ज़िन्दगी हो गई है अस्त व्यस्त
तब कभी याद करके देखना ...
दिल खोलके बात करके देखना ...
तुम्हारी सारी यादें मुस्कुराहटें, किस्से कहानियां, अब भी दिल के कोने में महक रहे हैं गुलदस्ते की तरह
फुर्सत मिले तो चले आना उन यादों में, फिर तफरी करेंगे बीते दिनों की तरह 


Monday, September 3, 2018

कुछ पंक्तियाँ ऐसे ही.... II


इस जबाब का सवाल कहीं खो गया है
हो सके तो दोबारा उठाना
कोशिशें तो कई चीज़ों की करी हैं आपने
हो सके तो फिर अपनी कलम को उठाना ......

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मैं तो निकली थी घर से तुम्हारे पास आने के लिए
पर मेरे कदम के दायरे उनके सवालों के दायरे से छोटे थे।
रस्ते के झींगुर और पपीहे से तो बचकर आ जाती 
पर उस भूरे काले बादल को मैं क्या मुँह दिखाती? 

मैं तो यही सोचती रही ..मुझे जाने ही क्यूँ दिया ,
रोक लिया होता उस दिन भी जैसे हर बार पकड़ के रोक लेते थे…. 
बस थोडा आनाकानी ही तो करती 
पर कुछ देर में मान ही जाती 

फिर तुम्हारे पास तो जलाने को सिगरेट भी थी,
 मेरे पास तो बस दिल था ....
वो तो कब का तुम्हें दे आई थी .....

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Monday, January 1, 2018

आगाज़

जैसे कलियों में छिपा है फूलों के महकने का अंदाज़,
जैसे नन्हे परों के ही बीच छिपा है चहकने का अंदाज़,
जैसे अंकुरों में हो कैद उस पेड़ के फलने फूलने का राज़,
जैसे सुबह कि पहली किरण को है अँधेरा भगाने पर नाज़,
जैसे हर किलकारी में गूंजता है मोहक हंसी के गीतों का साज,
जैसे उस अदनी सी बूँद को मिला है घट भरने का काज,
बस उसी तरह इन तस्वीरों को सजायेंगे कुछ चंद अलफ़ाज़
हमारी इस अदनी सी कोशिश से करते हैं हम इस संकलन का आगाज़ !!

Friday, May 26, 2017

प्यार है ....

प्यार है मुझे तुम्हारे गुस्से से, झुंझलाहट से, 
तुम्हे चौंका देने वाली उस रेल गाड़ी की आहट से..
प्यार है मुझे तुम्हारे आँखों के आंसुओं से,
माथे से टपकती हुई उन पसीने की बूंदों से..
तुम्हारे केशों में सजते हुए उस रूपल ताज से, 
तुम्हारी वक़्त बेवक़्त की खांसी में छिपे हुए साज़ से...  
प्यार है मुझे तुम्हारे डर से, तुम्हारी चिंता से , तकरार से,
मुझसे खुल के बेहिचक किए गए उस इनकार से..
प्यार है मुझे तुम्हारी माथे पर पड़ती सिलवटों से,
रात - बेरात तुम्हारी उन बेचैन करवटों से.. 
है प्यार मुझे तुम्हारी हर उस कमी से जो तुम्हें  'तुम' बनाती हैं  
क्यूंकि तुम्हारे होने से ही ये मुझे 'हम' बनाती हैं।  

Friday, August 7, 2015

मुखोटे


            ये कैसी मेरी भाषा है ये कैसी परिभाषा है
        क्यूँ मेरी हर निराशा में ये छिपी निरी आशा है
        क्यूँ जलने के बाद भी कोई ठंडक को न पाता है
         क्यूँ जीतने के बाद भी कोई हार ही को पाता है
    क्यूँ किसी अनजान में जान का अक्स नज़र आया है
      क्यूँ गिरने का भाव भी उस गिरी से लगता आया है
     क्यूँ होती है वो स-रिता फिर भी बहती चली आती है
        क्यूँ होता है जब सोना तब नींद ही न आती है
क्यूँ हिंसा के भीतर इन्सां दिखता है, क्यूँ दिखे है वानर में नर
क्यूँ दान में आन होना जरूरी है, क्यूँ जरी में भी दिखता है जर
     क्यूँ हम अपने वतन के वास्ते तन नत न कर पाते हैं
   सोचते हैं जीवन है क्या तो बस जीवों के वन को ही पाते हैं
     कैसा  है जगत प्रिया यहाँ मूल्यों के मूल इतने छोटे हैं
     कैसे ढूदे मानव यहाँ ओढ़े खड़े कितने मु-खोटे हैं  ...!!

Friday, July 31, 2015

बुद्धिजीवियों का खुदा

​हर नाइंसाफी के खिलाफ कदम उठाना ​यही सिखाया था न दुनिया का कायदा
पर काँप रहे थे दो हाथ जो सोच रहे थे कि उसे कलम थामना सिखाने का क्या हुआ फायदा 
वैसे तो मेरी इस कड़वी रचना का भी नहीं है कोई ख़ास फायदा
पर मेरी दो आँखें कल रात सोच रही थी कि चुपचाप नीर बहाने से भी नहीं कोई फायदा
तो चलिए मार्किट में एक नया खुदा लांच हुआ है …आइये वाकिफ होते हैं इन्से… ​


वो कागज़ के कई सफ़ेद चमकदार पन्नो को
घुमावदार नक्काशीदार अक्षरों से सजा रहा था
स्याही में सनी अपनी सुडौल उँगलियाँ से
मेज पर विजयी तबला बजा रहा था

वैसे क्या थी आज की विजय गाथा, शीर्षक था-
कैसे धर्म से भारत अधर्म के रस्ते को है जाता
हाँ वैसे उसे इस बात से दिक्कत नहीं
कि धर्म मौजूद है या नहीं
या फिर दुनिया में खुदा मौजूद है या नहीं

पर खुदा किस रंग या रूप का है ये बात पता करना ज़रूरी थी
अगर कोई सनसनीखेज - वंचित - पीड़ित - अबल खुदा को याद करे
और फिर भी ख़ुदा न सुने तो खुदा की ऐसी क्या मजबूरी थी..

पर एक मिनट ठहरो …… वो तो नास्तिकता के ख़याल को रखता था आबाद 
हाँ, इसलिए तो अब नास्तिकों के लिए नए धर्म को कर रहा है न इज़ाद
इस धर्म का पालन हर पढ़ा-लिखा बुद्धिजीव व्यक्ति करेगा
जो नहीं करेगा वो उसे कम अक्ल होने की उपाधि दे देगा
इस तरह वह अपनी कलम के बल से हर तरह के गरीब और हर प्रकार के दुखियारे की
बौद्धिक और भावनात्मक भूख को शांत करेगा .......
फिर वह साहसी, विद्वान,जुझारू और जागरूक कहलाएगा
बस एक बार यह नया धर्म चल जाए , बुद्धिजीवियों का खुद-आ भी कहलाएगा





Saturday, May 23, 2015

जनमदिन



कल मैं पूरे बारह बरस की हो जाऊँगी। 
कल से मैं भी दीदी की तरह सायानी कहलाऊँगी। 
अम्मा इसी दिन के इंतज़ार में थी 
बाबा न जाने क्योँ  दिखते  हैं दुखी !
खेत पर जाना तो है उनको 
पर बेर बेर खोलके देखते हैं सन्दूकी। 
बाबा कहते हैं मुझे अबसे पाठशाला नहीं जाना पड़ेगा 
पर माट साहब तो कहे थे गणित न दिखाए कल तो डंडा पड़ेगा 
सोचा निम्मी के हाथ से कापी भिजवा दूँगी जब खेलने जाऊँगी 
पर अम्मा कहती हैं वो संजा बखत में मुझे दाल चावल बनाना सिखाएंगी 
बाबा ने मेरे जनमदिन पे दो दो साड़ियां लाई  हैं 
अम्मा ने तेल लगा के कस के चुटिया बनाई है 
अम्मा-बाबा कहते हैं मेरे लिए उन्होने एक रिश्ता किया है मंजूर 
अगले महीने बिया है मेरा, आइएगा जरूर …… 

Friday, November 14, 2014

बचपन

         

वह अनमना सा बुझा बुझा चला जा रहा था
और माथे से पसीने की कुछ बूँदें टपका रहा था
क्या सचमुच गोदाम में पड़ी वो बोरियां थीं इतनी भारी 
या इससे भी बोझिल उसके नन्हे कन्धों पे थी कोई ज़िम्मेदारी
सूखे से होंठ हो चुके थेऔर आँखों के नीचे गड्ढे थे काले 
कटी थी उसकी एड़ियां और उसके नाज़ुक हाथों पे पड़े थे छाले
बस अपनी परछाईं से दूर भागने के प्रयास में 
और फिर अचानक से बस एक बार वो पाठशाला की घंटी सुनने की आस में
वो दौड़ रहा था अपनी ही धुन में होकर मगन 
शायद उसी ओर जहाँ पर वो छोड़ आया था अपना प्यारा सा बचपन 
हाँ वही बचपन जब वक़्त हमारे लिए होता था बड़ा सस्ता 
हमसे भी भारी होता था हमारे कंधे का बस्ता 
एक पेंसिल के खोने पे जो दिन भर ही थी मैं रोती
बड़ी से बड़ी गलती की सजा एक सॉरी से पूरी होती 
फिर अगर दीदी से आईस क्रीम के लिए हो जाये लड़ाई
तुरंत मनगढ़ंत शिकायत कर माँ से उसकी करवा देती थी पिटाई 
खेलने की जुंग में जब होम वर्क भी रह जाता था अधूरा 
दस बजने के बाद तो पापा सीरियल भी न देखने देते थे पूरा 
सारी मेहनत कर भी जब कक्षा में आ न पाता क्रमांक पहला 
टीचर के सामने रो-रोकर लेती थी मैं खुद को आंसुओं से नहला 
लेकिन जितने सीधे आंसू थेथी उतनी ही सच्ची मुस्कान 
बाहर की छल कपट की दुनिया से थी बिलकुल अनजान 

तो फिर क्यूँ मेरी और उस बालक कि मुस्कान में हो चला इतना फरक 
क्यूँ वह अपनी चाह की राह से हो चला इतना पृथक 
वह भी कलम थामे तो कल को डॉक्टर या इंजिनियर नहीं सकता है क्या बन 
अपने परिवार और देश की उन्नति के लिए क्या कर नहीं सकता जतन
क्या हममें से सभी, हैं नहीं इतने काबिल 
कि कर लें उस बालक को अपने पढ़े-लिखे दल में शामिल
मिलकर करें हम ये फैसला कि न हो कोई बचपन मजबूर
ऊपर उठे शिक्षित भारतन रहे कोई बाल मजदूर, न रहे कोई बाल मजदूर....

Thursday, October 16, 2014

हक़

कई ट्रेनें वहां से आई और गुज़र गई 
और उनके साथ आये और गए कई मुसाफिर 
वो लेकिन प्लेटफार्म की उसी बेंच पर बैठी थी 
उतनी ही मौन और उतनी ही स्थिर
और बोलती भी किससे कोई था भी तो नहीं उसके साथ 
पर उसे अबतक आदत पड़ ही गई थी खुद से करने की बात 

' गुड्डू को देखते ही उसे खूब सारी डाँट पिलाऊंगी 
खैर छोडो फिर उसे अपने हाथ के बने लड्डू कैसे खिलाऊँगी '
यही सोच उसने अपने हाथ में पकड़ी पोटली को सीने से भींचा 
और अपने एकमेव बेटे की छवि मन में आते ही पलकोँ को अनायास ही सींचा 

' वखत कहाँ मिलता होगा उसे, आज छुट्टी का दिन भी नहीं यूँ हड़बड़ाके आने के लिए 
इतनी तकलीफ करता ही न, पता दे देता, ज़रूरत भी न पड़ती लिबाने के लिए 
पता दे भी देता तो मैं कैसे बाँच  पाती 
पर बम्बई बड़ा सहर है, किसी को तो दिखा पाती '

दिन की चढ़ी धूप शाम के साथ गुलाबी हो गई 
और उसकी बुझती आस झुकती आँखो के साथ राज़ी हो गई 
' मुझे उठकर देखना चाहिए शायद बचपन में भी गुड्डू मेले की भीड़ में खो जाता था ...
या हो सकता है, अभी आता ही हो जैसे बचपन में छिपकर डरा जाता था '

लेकिन वो उठी नहीं ...प्लेटफार्म की उसी बेंच पर बैठी रही
बस वैसे ही जैसे बरगद का पेड़ सालो साल अपने जड़ो में सिमटी ज़मीं को जकड़े हो रख 
और करती भी क्या चौबीस घंटे में यही तो वो जगह थी जिसपर वो जमा सकती थी अपना हक़     

Friday, October 3, 2014

तू स्वतंत्र है

कहाँ गए वो वीर बहादुर जो अंग्रेज़ों से डटकर झूझे थे
और कहाँ गए वो लाल सपूत जो हर जंग में कूदे थे

क्या सारा उत्साह ठण्डाया है, और वही जोश पिघलाया है
क्यों दुर्व्यवहार पर भृकुटि तनती नहीं बस शर्म से सर झुकाया है

क्या संचारित नहीं होता अब गरम रक्त
क्यों बैठे हैं सब हम यूँ विरक्त

क्यों आँख के अंधे नयनसुख और कान के बहरे श्रवणकुमार हम
क्यों उसको दुर्बल, अबला और बेचारगी के नाम से जानें आज हम

क्यों पैदा होते ही बेटी पर लक्ष्मी की मुहर लगाते हो
पर फिर भी उसके पढ़ने से पहले उसके ब्याह की बाट जुहाते हो

क्यों किताबें - खिलोने छीन हाथ में करछी और कढ़ाई है
क्यों उसके सपनों के रंगो में यूँ सिन्दूरी रंग की स्याही है

वह रानी झाँसी की या दुर्गा बस मिसाल की ही तरह क्यों नज़र आई है
सति, अहिल्या और बन सीता क्यों हर दम अग्निपरीक्षाएं दिलवाई हैं

बस जलाने तेरे घर का चिराग
वो करे हर सपने का परित्याग

क्यों विवाह करना जैसे पूनःजन्म हो, उसकी पहचान को मिटाता है
माँ की कोख से जनम ले फिर भी संतान के नाम के आगे बस पिता का नाम जुड़ जाता है

क्यों भारत की गरिमा दहेज़ की आग में झुलसती और खुलेआम यूँ बेआबरू लटकी है
शर्मसार हो रही भारत की सभ्यता दानवता के मार्ग पर क्यों जा भटकी है

आओ मिलकर करें हम एक फैसला
दे उसे मान और स्वछन्द विहार का पूर्ण हौसला

वह महज लावण्य का प्रतीक न हो , वह तेजस्वी हो , विदूषी हो
वह महज पुरुषों के कामयाबी के पीछे नहीं उनकी हर जीत में समावेशी हो

वो किसी पर बोझ न हो , उसका जीवन भी यथार्थ हो
वह कोई दया का पात्र न हो , वो सक्षम हो , समर्थ हो

उठो भारत के नौजवानो हमें हिन्द की हर बेटी को बचाना है
हर घर की बेटी को कर सुखी, हमें भारत माँ को हँसाना है

और रहे हम तब तक प्रयत्नरत जब सूर्यास्त से न डरे कोई बेटी
और उसके माता-पिता ये न सोचे वो अबतक घर पर क्यों न लौटी

अब सहम न..... उठ खड़ी हो , पैरों की बेड़ी खोल और चुप्पी का ताला तोड़
जा विचर कर नील गगन में और बादलों से रिश्ता जोड़ .......

ऐसा रिश्ता जोड़ जैसे पिंजरे से छूटे हुआ कोई कैद परिंदा
और तेरी चहक की गूँज सुन कैद करने वाला भी हो शर्मिंदा … कैद करने वाला भी हो शर्मिंदा …… !!

Wednesday, July 16, 2014

मजबूरी

कौन है तू, तेरी क्या है पहचान ?
तू है इस देश का सार्वजनिक कूड़ादान !
तू वही  है जिसके नाम से सरकार योजनाएं करती हैं जारी
तू देता है योगदान, देश की बढ़ाने में बेरोज़गारी
तू अखबारों की सुर्ख़ियों में छाया रहता है
कभी ठण्ड में सिकुड़ कर मरता है तो कभी बाढ़  के पानी में बहता  है 
तू ही किसी मिलावटी सामान की इमारत के नीचे दबा कुचला जाता है
महंगाई जैसे बढ़ती है , भुखमरी का पहला थप्पड़ तू ही खाता है
तेरे ही हाथ में तलवार और बन्दूक थमाए जाएंगे
और साम्प्रदियिकता के कई रंग तेरे माथे लगाये जाएंगे
तू मेरी देश की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा है
संसद की चलती सभा भंग करने और बंद चाय की दूकान चालू करने के लिए सबसे सनसनीखेज किस्सा है
हाँ तू मेरे गरीब देश की व्याख्या में ढाला गया एक आम इंसान है जिसका पेशा है मजदूरी
जिसे आटे - दाल से भी अधिक महंगी पड़ती है मजबूरी …


Thursday, October 3, 2013

कुछ पंक्तियाँ ऐसे ही....


१ .बड़ी देर से बहुत तेज दौड़ रहे थे,
तो सोचा मंजिल को पा गए.
न जाने कैसा रास्ता चुना हमने
नज़र उठाकर देखा तो पाया
शून्य से चले थे फिर शून्य पे आ गए !!



२ . जिन्होंने फूलों पे ही कदम रखे हों, उन्हें तो कंकड़ भी लगते हैं शूल ..
और जिन्होंने चलना ही काँटों पे सीखा हो, उन्हें पत्थर भी लगते हैं फूल !!



३ .आसमान की तरफ देखा तो सब कुछ पंख लगा कर रहा था उड़
नज़र ज़मीन पर घुमाई तो पाया उस तूफ़ान में मेरा भी घर गया था उजड़ !!



४ .देखती थी जब भी मैं अपनी तकदीर
कोरी दिखती थी तेरे नाम की लकीर
मैं भी क्या उस ऊपरवाले को रहती कोस
या करती ऐसी तकदीर पर अफ़सोस
तेरे नाम की इस दिल पे कुछ ऐसी की थी मैंने लिखाई
कि हर दावात की खत्म हो गई थी स्याही.



५ . स्याही की जबान से एक आह सी थी निकली
उठी कलम तो तेरी यादें अलफ़ाज़ बन उतरी
तूने मुझे भुलाने की कोशिश में कई दिन होंगे काट
पर तेरे ही नाम के सहारे मेरी कई रातें हैं गुजरी...



६ . उनसे मांगी हमने थोड़ी सी ज़मीन बेघर न होने के लिए
दे दी दो फुट ज़मीन के नीचे आराम से सोने के लिए



७ . जो दूसरों के लिए घर बनाते हैं
वो अक्सर बिना छत के सो जाते हैं



८ . जब हुआ हमें इनकार से इकरार
तब करने लगे हम नफरत से भी प्यार
भीड़ में पाया जब खुद को अकेला
तो हमने भी कर लिया बेकरारी से करार



९ . दूर उस कुटिया में कुछ ख़ुशी है मनाई
बहती हवा में कुछ सूखी टहनियां बौराईं
न छोड़े है ये राग , न छोड़े ये इस काल में गाना
कैसे समझाएं इस पगली अकेली को- अभी दूर हैं सजना !!!



१० .जिन्हें कल तक मेरी मौजूदगी का इल्म न था
वो आज मेरे हमदर्द बनने का रखते हैं चाव 
जिन जख्मों का लहू सूख चूका था 
मरहम लगाने के बहाने फिर कुरेदते हैं मेरे वही घाव 




११ . मेरे जीवन में कुछ कमी का एहसास है 
जैसे साये को किसी ढलती रौशनी की प्यास है
मेरे आँखों में भी दिखती कोई आस है 
जैसे किसी अक्स को अपने आईने की तलाश है 




१२ . लगता था मुझे पहाड़ों से गूंजने वाली हर चीज़ हो सकती है केवल शोर...
पर टूटा मेरा भ्रम जब जाना मेरे ही खामोशियों का सन्नाटा गूँज रहा था सभी ओर




१३ . तुझे क्या लगता है ये गहने तेरी खूबसूरती बढ़ाते हैं
ये तो तुझपर सजकर खुद सुन्दर होने का एहसास पाते हैं...




१४ . क्यूँ मुझे इस अनजान शहर में यूं अकेले है छोड़ा 
या तो छोड़ देते, या ले जाते, लगता है मुझे बाँट दिया है बस थोड़ा थोड़ा.




१५ . सच्चा रहा बहुत हम दोनों का ही इश्क 
तू पीता रहा रंगीन पानी और मैं पीती रही अश्क 




१६ . मैं तेरी जीवन किताब का एक मामूली किस्सा हूँ 
न ही मैं प्रस्तावना न ही मैं किसी निष्कर्ष का हिस्सा हूँ 
मैं बस पिछले पन्ने से अगले पन्ने की कड़ी का जोड़ हूँ 
एक सड़क से दूसरी सड़क को जोड़ने के लिए बनाया एक मोड़ हूँ
ये पन्ना न भी हो तो किताब नहीं लगेगी अधूरी 
इस अधकचरे पन्ने के बिना भी होगी उतनी ही पूरी 
इस पन्ने पर ज्यादा वक़्त खर्चो न इसे जल्दी से उलटो 
आगे कई रंगीन पन्ने पड़े हैं इसे जल्दी से पलटो, जल्दी से पलटो ...




१७ . पिंजरे में कैद परिंदा था 
न जाने कैसे वो जिन्दा था
खुलते ही पिंजरा पंछी यूं चहका 
कि कैद करने वाला भी शर्मिंदा था ..




१८ . मैंने ये बात तो तुझसे कभी कही नहीं 
कि बिन तेरे मैं कभी रही नहीं 
नापनी थी मुझे सागर की गहराइयाँ 
फिर क्यूँ किनारे पर मैं खड़ी रही ...




१९ .साकी की तलाश में हम मधुशाला घूम आये 
मदिरा मिली नहीं तो बिन पीये ही झूम आये 
फिर उसकी आँखों में जब छलकता देखा मयखाने का प्याला 
उसकी एक ही नज़र ने मुझे बेसुध था कर डाला 




२० .उसने मेरे सब्र को बुजदिली का नाम दे डाला 
समझा ही नहीं महफ़िल में यूं बदनाम कर डाला 
यूं तो हम खामोशियों से कई लोगों को मार देते 
पर उसके एक जिक्र ने मुझे मेरा ही कातिल बना डाला 




२१ .जब से तारों से जुडी ज़िन्दगी 
बाकी सब से बेतार हो गई 
जब टूटे तारों को जोड़ना चाहा 
मेरी ही जिंदगी तार तार हो गई 




२२ . साथी नहीं बना सकते तो क्या गम 
कम से कम परछाईं तो रहने दो 
खुशियों की बारिश में भिगो नहीं सकते तो क्या गम 
कड़ी धूप में साथ रहने दो ...




२३ . एक गुलाब को खुशबू बिखेरने से ही रोका है 
कैसा नसीब मिला है अपने ही काटों से मुझे धोखा है ..




२४ . मुस्कुराने की ऐसी आदत लगी थी कि आंसुओं से होती है उलझन
अक्स किसका है ये सोचने लगती हूँ,  जब माथे पे दिखती है शिकन 
 इसलिए अब  मैं बंद कमरे में अकेले जोर जोर से हंसती हूँ
और अपने ही बुने हुए इस जाल में हर रोज थोडा और फंसती हूँ 




२५ . सब के ख्वाबों के आशियाँ में रंग भरते भरते,
मैं अपने टूटे मकान के टुकड़े न जोड़ पाई
हर एक की जश्न-ऐ -महफ़िल में इस कदर मदहोश हुई
की अपने ग़मों पे एक आंसू भी न बहा पाई .....




२६ . आज मेरे शहर की हवाओं का रुख बदल गया बेवक़्त …
अमीर के चेहरे से उड़ा पसीना, और गरीब के सर से छत ....




२७ . ये कैसा ईमान है जो मासूमों को करता है लहू-लुहान
मैं ता-उम्र रहना चाहूंगी बे-ईमान ……
गर मौजूद होता खुदा तो वो भी करता फ़रियाद
मत कर मेरे नाम से ऐसा मजहब इज़ाद ....  




२८ . उन्हें मेरी हिफाज़त करना खूब आता है
चार दीवारों में समेटकर ....
 इसलिए मैं शब्द भी समेट के रखती हूँ …
 कहीं बेपरवान न हो जाये ....



२९ . सिलवटें , जो बिस्तर पे पड़ें तो सोने न दें 
जो माथे पे पड़ें तो खुश होने न दें ...... 




३० . उस परवरदिगार की इबादत के मुख्तलिफ तरीके हैं 
न भूलें उस तालीम को जो हम अपनी पाठशाला में सीखे हैं 
किसी एक खुदा का घर जलाकर, दूसरे खुदा के ज़िंदाबाद के नारे लगाएंगे 
ये खून से सने हाथ लेकर कौनसे खुदा को हम अपना मुँह दिखाएंगे 
गर हम अपने भीतर के ईमान के बदले सिर्फ अहम् को हवा देंगे 
नागरिकता तो फिर भी बचा लेंगे हम, इंसानियत ज़रूर गवाँ देंगे !




३१ . ​किसी और की ज़िन्दगी लगे बेज़ार और सस्ती 
इतनी बड़ी नहीं किसी मजहबी की हस्ती




३२ . आज भी मेरा कुछ अक्स  तुझमे बसता है 
मैं आहें भरती  हूँ, तब वो अक्स  हँसता है 
सोचा था मिलकर तुझसे मांग लूंगी अपने आप को 
लेकिन फिर देखा, बिन उसके तू कुछ अधूरा लगता है ......




३३. ​नफरत करने के बहाने फिर तुम से छुप छुप के प्यार हम करते रहे.
तुम जता नहीं सके, इसलिए तुम्हारे आंसू हम अपनी आँख में भरते रहे...




३४. मैं घर में रोज़ाना ताला लगाता रहा उसे बाहरवालों से सुरक्षित रखने के लिए 
एक दिन अचानक ही तूफ़ान  आ गया, अब छत ही नहीं रही सर ढकने के लिए !

Thursday, September 19, 2013

फूलों की बगिया



एक दिन फूलों वाली बगिया में चल रही थी कोई क्लास
सारे फूल बता रहे थे अपने जीवन का कुछ हेतु ख़ास
कहा एक ने 'मैं हूँ सदभावना का प्रतीक, जब मिलते हैं मुझसे अनेक
जुड़ जाता हूँ बंधन में और माला में बनकर रहता हूँ में एक'
दूजे ने कहा 'मैंने तो सीखा है बस जीवन में करना अर्पण
अपने जीवन को धन्य कर मैं तो छूता हूँ प्रभु के नित चरण'
तीसरा कुछ शरमाया, पहले थोडा हिचकिचाया
फिर बोला 'दो प्रेमोयों के प्यार को मैंने ही तो है बढ़ाया'
दूर लगा वो फूल बोलने के लिए ढूंढ़ रहा था कुछ वक़्त सटीक
महिलाओं के केशों में तो सजकर मैं बनता हूँ सुंदरता का प्रतीक
फिर उस महकते पुष्प ने कुछ अपनी छाती फुलाई
वीरों के पथ पर शयन करने की हमने तो कसम है खायी
एक फूल कुछ थोडा दुखी था,कुछ दिख रही थी उसकी लाचारी
मृत देहों पर सजकर रहना था, था उसका दुःख कुछ भारी
लेकिन उन सब पुष्पों में से था एक पुष्प बिलकुल मौन
सब पुष्पों ने मिलकर पूछा, आखिर ये है कौन
क्या तुम्हारे जीवन का कुछ हेतु नहीं है भाई
बाकी सब दोस्तों ने तो है अपनी जीवन गाथा बतलाई
'हूँ तुममें से ही एक दोस्तों, मैं करता हूँ खुशबू का प्रसार
मुरझाने के बाद मेरी पंखुड़ियाँ करें नए जीवन का संचार
अपने जीवन में रहते हर भंवरे को करवाऊंगा मधु रस का मैं पान
फिर समय पूरा होने पे सौपूंगा किसी और को जीवन का वरदान'
इसी तरह किया उस फूल ने अपने सभी दोस्तों का गुण-गान.

Monday, August 26, 2013

बंटवारा

आज घर का बंटवारा करना था, बांटना था उन्हें अपना सारा सामान
पर सोच में खड़े थे दोनों , कैसे बँटता उनके सर के ऊपर का खुला आसमान ...
कैसे हिसाब होता कौनसी हँसी तेरी थी या थी मेरी
और कैसे लगता हिसाब की किसने किसके लिए कितनी नींदें थी वारी ..
कैसे बँटता वो वक़्त जिसकी अनमोल थी कीमत
और कैसे बँटता वो जहाँ जो दोनों की बाँहों में था सीमित
हाँ वैसे तो सारा सामान बँट चूका है बस कुछ बिखरे पल हैं बाकी
सोच में खड़े हैं दोनों , सर के ऊपर का खुला आसमान अब भी है बाकी .....

Wednesday, July 31, 2013

इंतज़ार



माना कि सारी उम्र के हमसफ़र न बन सके
पर कुछ दूर तो मेरे साथ चलते
इन चंद लम्हों की सोहबत में ही
हम अपनी ताउम्र जी लेते...

माना कि मेरे नाम से तेरा नाम जोड़ा जाना गंवारा न था तुझे
पर ख़त के उन पन्नों पे तो रहने देते
हम उन अल्फाजों की स्याही से ही
अपनी सारी ज़िन्दगी रंग लेते ....

माना कि हमसे मिलना तेरे उसूलों में नहीं
पर हमें इंतज़ार तो बेशक करने देते
तुम्हारे खयालों ​के होने से ही

हम तेरी मौजूदगी को महसूस करते रहते .... 

Monday, December 10, 2012

आखरी हसरत




 न जाने कितने बरसों से सूनी पड़ी थी उसकी फुलवारी
टूटा घर का सन्नाटा, उसके घर में भी गूंजी एक किलकारी
ओझल हो जाती चेहरे की शिकन, दूर हो जाती सब थकान
चेहरे पे जब भी देख लेती वो अपने प्यारे की मुस्कान

याद है उसे आज भी वो दिन जब उसकी ख़ुशी का कुछ ठिकाना था न रहा
अपनी प्यारी तोतली जबान में जब उसने पहली बार माँ था कहा
उसी माँ का हाथ थामे उसने अपना पहला कदम था बढाया
उसी माँ ने तो उस दुलारे को हाथ में कलम थामना था सिखाया
कितने बार टूटे होंगे क्रिकेट की गेंद से पड़ोसियों के खिडकियों के काँच
लेकिन सबसे लड़ लेती वो, न आने देती अपने बेटे पर कोई आँच
न जाने कितनी बार होमेवोर्क न होने पर उसकी कॉपी थी घर पर वापिस आई
काम क्यूँ नहीं करता तुम्हारा दुलारा शिक्षक ने मांगी थी सफाई
फिर कभी गलती न करना ये कसम भी तो थी उसी ने दिलाई
इसी शर्त पर तो ये बात दुलारे के पापा से थी छिपाई
यही सब याद करते छा जाती है उसकी आँखों में नमी
दुलारा हो चला है इंजीनियर उसे रही नहीं किसी बात की कमी

अपनी मर्ज़ी से उसने अपना नया परिवार है बसाया
अपनी काबिलियत से उसने शोहरत और नाम है कमाया
तरक्की ऐसी की सब दूना हो गया, घर भी एक के दो हो चले हैं
माँ के साथ एक छत के नीचे रहना ऐसे रुढ़िवादी विचार क्या लगते भले हैं !
घंटे घंटे फ़ोन के पास बैठी रहती वो, कभी तो बेटा फ़ोन करेगा
यूहीं दरवाजे के सौ चक्कर लगाती, कभी तो राह भूल यहाँ से गुजरेगा
इसी तरह कट रही थी उसकी अनगिनत सुबह और शाम
न कभी बेटा घर का रास्ता भूला, न ही कभी आया कोई पैगाम

एक रोज़ बेटे के पास किसी शुभचिंतक का फ़ोन था आया
माँ  बीमार हैं तुम्हारी- मिल जाओ, ये संदेसा था भिजवाया
बेटा बुदबुदाया, 'न जाने माँ क्यूँ करती हैं फ़ोन बार बार
शायद पैसे चाहिए, ये सोच भिजवा दिए कुछ हज़ार
बेटा अनजान था, शायद इतनी लक्ष्मी तो माँ के घर में भी थी बरसती
लेकिन फिर भी उस माँ की आँखें अपने बेटे की एक झलक के लिए थी तरसती
बीत गए दिन बीते महीने पर उसे मिल न पाई इतनी फुरसत
कि कर आता पूरी अपनी माँ कि वो आखरी हसरत, आखरी हसरत !!