Wednesday, July 16, 2014

मजबूरी

कौन है तू, तेरी क्या है पहचान ?
तू है इस देश का सार्वजनिक कूड़ादान !
तू वही  है जिसके नाम से सरकार योजनाएं करती हैं जारी
तू देता है योगदान, देश की बढ़ाने में बेरोज़गारी
तू अखबारों की सुर्ख़ियों में छाया रहता है
कभी ठण्ड में सिकुड़ कर मरता है तो कभी बाढ़  के पानी में बहता  है 
तू ही किसी मिलावटी सामान की इमारत के नीचे दबा कुचला जाता है
महंगाई जैसे बढ़ती है , भुखमरी का पहला थप्पड़ तू ही खाता है
तेरे ही हाथ में तलवार और बन्दूक थमाए जाएंगे
और साम्प्रदियिकता के कई रंग तेरे माथे लगाये जाएंगे
तू मेरी देश की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा है
संसद की चलती सभा भंग करने और बंद चाय की दूकान चालू करने के लिए सबसे सनसनीखेज किस्सा है
हाँ तू मेरे गरीब देश की व्याख्या में ढाला गया एक आम इंसान है जिसका पेशा है मजदूरी
जिसे आटे - दाल से भी अधिक महंगी पड़ती है मजबूरी …


7 comments:

  1. Yantu ... badia hai ...lage raho

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  2. good one! as usual! :)

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  3. reminds of the gazal `हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी..by Nida fazli
    ..सुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआ
    अपनी ही लाश का खुद मज़ार आदमी...

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  4. Very nice and thoughtful.......तेरे ही हाथ में तलवार और बन्दूक थमाए जाएंगे...But it is unfortunate that the poor person, who are already deprived from many basic necessity of life, are used as tools by many most selfish human. I strongly abuse those selfish human who are actually devil in form of human. .........cool..cool..sayad kuchh jyada hee likh diya maine....any way ur poem is very heart touching to me.

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