तो सोचा मंजिल को पा गए.
न जाने कैसा रास्ता चुना हमने
नज़र उठाकर देखा तो पाया
शून्य से चले थे फिर शून्य पे आ गए !!
२ . जिन्होंने फूलों पे ही कदम रखे हों, उन्हें तो कंकड़ भी लगते हैं शूल ..
और जिन्होंने चलना ही काँटों पे सीखा हो, उन्हें पत्थर भी लगते हैं फूल !!
३ .आसमान की तरफ देखा तो सब कुछ पंख लगा कर रहा था उड़
नज़र ज़मीन पर घुमाई तो पाया उस तूफ़ान में मेरा भी घर गया था उजड़ !!
४ .देखती थी जब भी मैं अपनी तकदीर
कोरी दिखती थी तेरे नाम की लकीर
मैं भी क्या उस ऊपरवाले को रहती कोस
या करती ऐसी तकदीर पर अफ़सोस
तेरे नाम की इस दिल पे कुछ ऐसी की थी मैंने लिखाई
कि हर दावात की खत्म हो गई थी स्याही.
५ . स्याही की जबान से एक आह सी थी निकली
उठी कलम तो तेरी यादें अलफ़ाज़ बन उतरी
तूने मुझे भुलाने की कोशिश में कई दिन होंगे काट
पर तेरे ही नाम के सहारे मेरी कई रातें हैं गुजरी...
६ . उनसे मांगी हमने थोड़ी सी ज़मीन बेघर न होने के लिए
दे दी दो फुट ज़मीन के नीचे आराम से सोने के लिए
७ . जो दूसरों के लिए घर बनाते हैं
वो अक्सर बिना छत के सो जाते हैं
८ . जब हुआ हमें इनकार से इकरार
तब करने लगे हम नफरत से भी प्यार
भीड़ में पाया जब खुद को अकेला
तो हमने भी कर लिया बेकरारी से करार
९ . दूर उस कुटिया में कुछ ख़ुशी है मनाई
बहती हवा में कुछ सूखी टहनियां बौराईं
न छोड़े है ये राग , न छोड़े ये इस काल में गाना
कैसे समझाएं इस पगली अकेली को- अभी दूर हैं सजना !!!
१० .जिन्हें कल तक मेरी मौजूदगी का इल्म न था
वो आज मेरे हमदर्द बनने का रखते हैं चाव
जिन जख्मों का लहू सूख चूका था
मरहम लगाने के बहाने फिर कुरेदते हैं मेरे वही घाव
११ . मेरे जीवन में कुछ कमी का एहसास है
जैसे साये को किसी ढलती रौशनी की प्यास है
मेरे आँखों में भी दिखती कोई आस है
जैसे किसी अक्स को अपने आईने की तलाश है
१२ . लगता था मुझे पहाड़ों से गूंजने वाली हर चीज़ हो सकती है केवल शोर...
पर टूटा मेरा भ्रम जब जाना मेरे ही खामोशियों का सन्नाटा गूँज रहा था सभी ओर
१३ . तुझे क्या लगता है ये गहने तेरी खूबसूरती बढ़ाते हैं
ये तो तुझपर सजकर खुद सुन्दर होने का एहसास पाते हैं...
१४ . क्यूँ मुझे इस अनजान शहर में यूं अकेले है छोड़ा
या तो छोड़ देते, या ले जाते, लगता है मुझे बाँट दिया है बस थोड़ा थोड़ा.
१५ . सच्चा रहा बहुत हम दोनों का ही इश्क
तू पीता रहा रंगीन पानी और मैं पीती रही अश्क
१६ . मैं तेरी जीवन किताब का एक मामूली किस्सा हूँ
न ही मैं प्रस्तावना न ही मैं किसी निष्कर्ष का हिस्सा हूँ
मैं बस पिछले पन्ने से अगले पन्ने की कड़ी का जोड़ हूँ
एक सड़क से दूसरी सड़क को जोड़ने के लिए बनाया एक मोड़ हूँ
ये पन्ना न भी हो तो किताब नहीं लगेगी अधूरी
इस अधकचरे पन्ने के बिना भी होगी उतनी ही पूरी
इस पन्ने पर ज्यादा वक़्त खर्चो न इसे जल्दी से उलटो
आगे कई रंगीन पन्ने पड़े हैं इसे जल्दी से पलटो, जल्दी से पलटो ...
१७ . पिंजरे में कैद परिंदा था
न जाने कैसे वो जिन्दा था
खुलते ही पिंजरा पंछी यूं चहका
कि कैद करने वाला भी शर्मिंदा था ..
१८ . मैंने ये बात तो तुझसे कभी कही नहीं
कि बिन तेरे मैं कभी रही नहीं
नापनी थी मुझे सागर की गहराइयाँ
फिर क्यूँ किनारे पर मैं खड़ी रही ...
१९ .साकी की तलाश में हम मधुशाला घूम आये
मदिरा मिली नहीं तो बिन पीये ही झूम आये
फिर उसकी आँखों में जब छलकता देखा मयखाने का प्याला
उसकी एक ही नज़र ने मुझे बेसुध था कर डाला
२० .उसने मेरे सब्र को बुजदिली का नाम दे डाला
समझा ही नहीं महफ़िल में यूं बदनाम कर डाला
यूं तो हम खामोशियों से कई लोगों को मार देते
पर उसके एक जिक्र ने मुझे मेरा ही कातिल बना डाला
२१ .जब से तारों से जुडी ज़िन्दगी
बाकी सब से बेतार हो गई
जब टूटे तारों को जोड़ना चाहा
मेरी ही जिंदगी तार तार हो गई
२२ . साथी नहीं बना सकते तो क्या गम
कम से कम परछाईं तो रहने दो
खुशियों की बारिश में भिगो नहीं सकते तो क्या गम
कड़ी धूप में साथ रहने दो ...
२३ . एक गुलाब को खुशबू बिखेरने से ही रोका है
कैसा नसीब मिला है अपने ही काटों से मुझे धोखा है ..
हर एक की जश्न-ऐ -महफ़िल में इस कदर मदहोश हुई
की अपने ग़मों पे एक आंसू भी न बहा पाई .....
२६ . आज मेरे शहर की हवाओं का रुख बदल गया बेवक़्त …
अमीर के चेहरे से उड़ा पसीना, और गरीब के सर से छत ....
कहीं बेपरवान न हो जाये ....
२४ . मुस्कुराने की ऐसी आदत लगी थी कि आंसुओं से होती है उलझन
अक्स किसका है ये सोचने लगती हूँ, जब माथे पे दिखती है शिकन
इसलिए अब मैं बंद कमरे में अकेले जोर जोर से हंसती हूँ
और अपने ही बुने हुए इस जाल में हर रोज थोडा और फंसती हूँ
२५ . सब के ख्वाबों के आशियाँ में रंग भरते भरते,
मैं अपने टूटे मकान के टुकड़े न जोड़ पाई२६ . आज मेरे शहर की हवाओं का रुख बदल गया बेवक़्त …
२७ . ये कैसा ईमान है जो मासूमों को करता है लहू-लुहान
मैं ता-उम्र रहना चाहूंगी बे-ईमान ……
गर मौजूद होता खुदा तो वो भी करता फ़रियाद
मत कर मेरे नाम से ऐसा मजहब इज़ाद .... मैं ता-उम्र रहना चाहूंगी बे-ईमान ……
गर मौजूद होता खुदा तो वो भी करता फ़रियाद
२८ . उन्हें मेरी हिफाज़त करना खूब आता है
चार दीवारों में समेटकर ....
इसलिए मैं शब्द भी समेट के रखती हूँ …कहीं बेपरवान न हो जाये ....
२९ . सिलवटें , जो बिस्तर पे पड़ें तो सोने न दें
जो माथे पे पड़ें तो खुश होने न दें ......
३० . उस परवरदिगार की इबादत के मुख्तलिफ तरीके हैं
न भूलें उस तालीम को जो हम अपनी पाठशाला में सीखे हैं
किसी एक खुदा का घर जलाकर, दूसरे खुदा के ज़िंदाबाद के नारे लगाएंगे
ये खून से सने हाथ लेकर कौनसे खुदा को हम अपना मुँह दिखाएंगे
गर हम अपने भीतर के ईमान के बदले सिर्फ अहम् को हवा देंगे
नागरिकता तो फिर भी बचा लेंगे हम, इंसानियत ज़रूर गवाँ देंगे !
३१ . किसी और की ज़िन्दगी लगे बेज़ार और सस्ती
इतनी बड़ी नहीं किसी मजहबी की हस्ती
३२ . आज भी मेरा कुछ अक्स तुझमे बसता है
३२ . आज भी मेरा कुछ अक्स तुझमे बसता है
मैं आहें भरती हूँ, तब वो अक्स हँसता है
सोचा था मिलकर तुझसे मांग लूंगी अपने आप को
लेकिन फिर देखा, बिन उसके तू कुछ अधूरा लगता है ......
३३. नफरत करने के बहाने फिर तुम से छुप छुप के प्यार हम करते रहे.
तुम जता नहीं सके, इसलिए तुम्हारे आंसू हम अपनी आँख में भरते रहे...
३३. नफरत करने के बहाने फिर तुम से छुप छुप के प्यार हम करते रहे.
तुम जता नहीं सके, इसलिए तुम्हारे आंसू हम अपनी आँख में भरते रहे...
३४. मैं घर में रोज़ाना ताला लगाता रहा उसे बाहरवालों से सुरक्षित रखने के लिए
एक दिन अचानक ही तूफ़ान आ गया, अब छत ही नहीं रही सर ढकने के लिए !
Great! Priyanka.maza as gaya
ReplyDelete