Thursday, September 19, 2013

फूलों की बगिया



एक दिन फूलों वाली बगिया में चल रही थी कोई क्लास
सारे फूल बता रहे थे अपने जीवन का कुछ हेतु ख़ास
कहा एक ने 'मैं हूँ सदभावना का प्रतीक, जब मिलते हैं मुझसे अनेक
जुड़ जाता हूँ बंधन में और माला में बनकर रहता हूँ में एक'
दूजे ने कहा 'मैंने तो सीखा है बस जीवन में करना अर्पण
अपने जीवन को धन्य कर मैं तो छूता हूँ प्रभु के नित चरण'
तीसरा कुछ शरमाया, पहले थोडा हिचकिचाया
फिर बोला 'दो प्रेमोयों के प्यार को मैंने ही तो है बढ़ाया'
दूर लगा वो फूल बोलने के लिए ढूंढ़ रहा था कुछ वक़्त सटीक
महिलाओं के केशों में तो सजकर मैं बनता हूँ सुंदरता का प्रतीक
फिर उस महकते पुष्प ने कुछ अपनी छाती फुलाई
वीरों के पथ पर शयन करने की हमने तो कसम है खायी
एक फूल कुछ थोडा दुखी था,कुछ दिख रही थी उसकी लाचारी
मृत देहों पर सजकर रहना था, था उसका दुःख कुछ भारी
लेकिन उन सब पुष्पों में से था एक पुष्प बिलकुल मौन
सब पुष्पों ने मिलकर पूछा, आखिर ये है कौन
क्या तुम्हारे जीवन का कुछ हेतु नहीं है भाई
बाकी सब दोस्तों ने तो है अपनी जीवन गाथा बतलाई
'हूँ तुममें से ही एक दोस्तों, मैं करता हूँ खुशबू का प्रसार
मुरझाने के बाद मेरी पंखुड़ियाँ करें नए जीवन का संचार
अपने जीवन में रहते हर भंवरे को करवाऊंगा मधु रस का मैं पान
फिर समय पूरा होने पे सौपूंगा किसी और को जीवन का वरदान'
इसी तरह किया उस फूल ने अपने सभी दोस्तों का गुण-गान.

No comments:

Post a Comment