मैं हूँ हर इमारत की बेजोड़ बुनियाद
ईंट मेरी इकाई है और सीमेंट, पत्थर से हुई हूँ मैं ईजाद
मानव जाती ने ही किया है मेरा आविष्कार
अब तक मुझे पहचान ही लिया होगा - मेरा नाम है दीवार।
मेरी अंदरूनी ताकत से हर इमारत की नींव परखी जाती है
सूरज की बिखरी किरनों में मेरी परछाई दूर-दूर तक जाती है
मैं हूँ चीन में, बर्लिन में, कुम्भलगढ़ में और दुनिया के हर कोने में
पानी को जो संचित करना है, मैं हूँ उस बांध के होने में
किसी भी निर्माण की सीमा होती नहीं मेरे बिना
मेरे नाम पर तो मशहूर सिनेमा भी है बना
मैं अक्सर चार बहनों के समूह में ही आती हूँ
मेरे कान तेज़ हैं, बच के रहना, आपकी सारी बातें सुन पाती हूँ
मुझको पलस्तर कर और रंग भर आप लोग खूब सजाते हो
खुद के मन को लुभाने के लिए सुन्दर तस्वीरें भी टँगाते हो
मौसम के बदलते मिज़ाज़ को मैं अपने ढाल से हूँ रोके
इन सभी का सही मात्रा में लुत्फ़ उठाने के लिए मैंने ही खुद में दिए हैं झरोके
मैंने अपने भीतर कई अबलाओं के सपनों को दम तोड़ते है देखा
आज भी घर की कई सीताओं की मैं ही हूँ वो लक्ष्मण रेखा
मैं घर, ज़मीन, जायदाद के लिए फ़ौरन ही खिंच जाती हूँ
कोई भी दो लोगों में जब भेद करना हो तो मैं तुरंत ही बिछ जाती हूँ
बात गर धर्म, जाति या देश की आये तो मैं बस खड़ी हो जाती हूँ
आपकी हैसियत और अहम् से भी ज्यादा मैं उस वक़्त बड़ी हो जाती हूँ
मैं देख पाती हूँ सर्वत्र पर अफ़सोस है कि मैं हूँ मूक
मेरे एक ओर पकवान बनते हैं और दूजी ओर कतारों में लगती है भूँक
आप मुझे कितना भी कोसिये पर मैं अपना फ़र्ज़ सच्चाई से निभाती हूँ
इस हिस्से की हकीकत उस हिस्से से बखूबी छुपाती हूँ
मैं आपको महफूज़ रखूंगी चाहे धूप हो या बारिश
इसके बदले आपसे करनी है एक छोटी सी गुज़ारिश
मुझे अपने घर में बेशक शामिल करें पर अपने दिलों से रखें दूर
मैं तो हूँ ही पत्थर दिल क्या करूँ, पर आप न हों मजबूर !!
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