मैं दिन भर चुपचाप मुस्कुराती हूँ
बस रात में तकिये के कोने भिगोती हूँ
इस बात की उन्हें मुझसे शिकायत है
मैं उनकी महफ़िलों में खुलकर शामिल नहीं होती
उनकी मस्खरियों पर अब खुल के ठहाका नहीं लगाती
इस बात की उन्हें मुझसे शिकायत है
रोटियां गिन कर बनती हैं घर में , 'बस केवल एक ?'
इस बात की उन्हें मुझसे शिकायत है
एक अरसा था जब मेरे घर देरी से आना
इस बात की उन्हें मुझसे शिकायत थी
आज मैं अपने कमरे में पूरा दिन बंद क्यूँ हूँ
इस बात की उन्हें मुझसे शिकायत है
काम के लिए मेरा उतावलापन रोके न रुकता था
आज मैं दफ्तर क्यूँ नहीं जाना चाहती
इस बात की उन्हें मुझसे शिकायत है
दुनिया में हो रहे हर सही-गलत के लिए लड़ना मिज़ाज था मेरा
आज हालातों से क्यूँ नहीं लड़ती
इस बात की उन्हें मुझसे शिकायत है
कई मरतबा मेरे अल्फ़ाज़ों ने बहुत कुछ बयाँ किया है
आज क्या नया ढूंढ रहे हो नज़म में प्रिए
मेरी खामोशियाँ क्यूँ सुनाई नहीं देती
इस बात की मुझे उन सब से शिकायत है।
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