Friday, August 23, 2019

उदासीनता (Indifference)

             

मैं सर झुका के चली जाती हूँ रोज़ उसी सड़क से 
उस सड़क पर कई गाड़ियां जाम में रोजाना फँसती हैं 
वाहन चालक एक दूसरे पर हार्न बजा कर अपने दिन और दिल दोनों की झल्लाहत निकालते हैं 
पर मुझे क्या फर्क पड़ता है, मेरा घर दफ्तर से पास ही है 
मुझे लेने कंपनी की बस आती है, मैं उसी में बैठी रहती हूँ , कान में रेडियो लगाए !

शहर के बीचों -बीच हाट लगता  है 
ताज़ी हरी सब्ज़ियां, रंगीन कपडे, चमकीले बर्तन, पूजा का सामान 
बेचने वाला पहले एक ऊंची बोली लगाता है.. 
फिर ग्राहक का मिज़ाज़ देखकर भाव सीढ़ी से उतारने लगता है 
मैं इस मोलभाव की बहस पर ख़ास गौर नहीं देती, मेरा सारा राशन बिग बास्केट से आता है  
मैं अपनी आँखों पर धूप का चश्मा चढ़ा लेती हूं, मुझे धूप सहन नहीं होती !

हर सुबह मेरे घर में अखबार आता है, फिर आज तो शनिवार है 
हर शनिवार चाय की चुस्की के साथ अखबार पढ़ना आदत है मेरी 
अखबार की सुर्ख़ियों कई लोगों की आपबीतियों से सुर्ख हैं  
भुखमरी, गरीबी, हिंसा, नफरत, जंग, साम्प्रदायिकता हर पहलू पर एक खबर ज़रूर छपी है 
घने जंगल जल रहे हैं, देश नफरत की आग में पिघल रहे हैं 
मैं अपने घरवालों  से  दूरभाष द्वारा संपर्क करती हूँ, उनका और मौसम का हालचाल लेती हूं 
फिर अपने घर की खिड़कियां बंद कर लेटी हूँ
A.C. चलाना पड़ता है करीब करीब पूरे साल, गरमी हर दिन बढ़ रही है !

अरे मैंने कल की बात तो आप लोगों को बताई ही नहीं 
मैंने कल घर के बहार अपने पडोसी को शाम को देखा 
उसने मुझे देख कर भी अनदेखा कर दिया .... न कोई मुस्कराहट, न दुआ- सलाम
 ये बड़े शहर के लोग भी बड़े मतलबी हो गए हैं 
बिना ज़रुरत के कोई सर उठाकर भी नहीं देखता, पर मुझे ये उदासीनता बिलकुल पसंद नहीं ! 

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