Friday, July 31, 2015

बुद्धिजीवियों का खुदा

​हर नाइंसाफी के खिलाफ कदम उठाना ​यही सिखाया था न दुनिया का कायदा
पर काँप रहे थे दो हाथ जो सोच रहे थे कि उसे कलम थामना सिखाने का क्या हुआ फायदा 
वैसे तो मेरी इस कड़वी रचना का भी नहीं है कोई ख़ास फायदा
पर मेरी दो आँखें कल रात सोच रही थी कि चुपचाप नीर बहाने से भी नहीं कोई फायदा
तो चलिए मार्किट में एक नया खुदा लांच हुआ है …आइये वाकिफ होते हैं इन्से… ​


वो कागज़ के कई सफ़ेद चमकदार पन्नो को
घुमावदार नक्काशीदार अक्षरों से सजा रहा था
स्याही में सनी अपनी सुडौल उँगलियाँ से
मेज पर विजयी तबला बजा रहा था

वैसे क्या थी आज की विजय गाथा, शीर्षक था-
कैसे धर्म से भारत अधर्म के रस्ते को है जाता
हाँ वैसे उसे इस बात से दिक्कत नहीं
कि धर्म मौजूद है या नहीं
या फिर दुनिया में खुदा मौजूद है या नहीं

पर खुदा किस रंग या रूप का है ये बात पता करना ज़रूरी थी
अगर कोई सनसनीखेज - वंचित - पीड़ित - अबल खुदा को याद करे
और फिर भी ख़ुदा न सुने तो खुदा की ऐसी क्या मजबूरी थी..

पर एक मिनट ठहरो …… वो तो नास्तिकता के ख़याल को रखता था आबाद 
हाँ, इसलिए तो अब नास्तिकों के लिए नए धर्म को कर रहा है न इज़ाद
इस धर्म का पालन हर पढ़ा-लिखा बुद्धिजीव व्यक्ति करेगा
जो नहीं करेगा वो उसे कम अक्ल होने की उपाधि दे देगा
इस तरह वह अपनी कलम के बल से हर तरह के गरीब और हर प्रकार के दुखियारे की
बौद्धिक और भावनात्मक भूख को शांत करेगा .......
फिर वह साहसी, विद्वान,जुझारू और जागरूक कहलाएगा
बस एक बार यह नया धर्म चल जाए , बुद्धिजीवियों का खुद-आ भी कहलाएगा





Saturday, May 23, 2015

जनमदिन



कल मैं पूरे बारह बरस की हो जाऊँगी। 
कल से मैं भी दीदी की तरह सायानी कहलाऊँगी। 
अम्मा इसी दिन के इंतज़ार में थी 
बाबा न जाने क्योँ  दिखते  हैं दुखी !
खेत पर जाना तो है उनको 
पर बेर बेर खोलके देखते हैं सन्दूकी। 
बाबा कहते हैं मुझे अबसे पाठशाला नहीं जाना पड़ेगा 
पर माट साहब तो कहे थे गणित न दिखाए कल तो डंडा पड़ेगा 
सोचा निम्मी के हाथ से कापी भिजवा दूँगी जब खेलने जाऊँगी 
पर अम्मा कहती हैं वो संजा बखत में मुझे दाल चावल बनाना सिखाएंगी 
बाबा ने मेरे जनमदिन पे दो दो साड़ियां लाई  हैं 
अम्मा ने तेल लगा के कस के चुटिया बनाई है 
अम्मा-बाबा कहते हैं मेरे लिए उन्होने एक रिश्ता किया है मंजूर 
अगले महीने बिया है मेरा, आइएगा जरूर …… 

Sunday, March 29, 2015

No, not today....

No, not today....
I dont wanna look amazing every single day...
Why is it I need to tie my hair neat and tidy 
Why is it I need to wear my cotton churidaars all wrinkle free
No, not today 
I just wanna let my hair down today
and love my shabby pyjamas till the end of the day...
Please dont expect me to cook the best of the meal..just today
Please lemme drive my scooter for a looong ride on my own way..
I dont wanna come home till the sun goes down to sleep
Please lemme forget all those promises and pride which I ought to keep..
Lemme drink, eat and dance....and just let me sing those songs....
Please dont judge me today by my words and forget all my wrongs....  
Lemme not keep waiting for trifle joys in the shroud of sorrows...
Please give me my today so that I no more long for tomorrows...

Friday, November 14, 2014

बचपन

         

वह अनमना सा बुझा बुझा चला जा रहा था
और माथे से पसीने की कुछ बूँदें टपका रहा था
क्या सचमुच गोदाम में पड़ी वो बोरियां थीं इतनी भारी 
या इससे भी बोझिल उसके नन्हे कन्धों पे थी कोई ज़िम्मेदारी
सूखे से होंठ हो चुके थेऔर आँखों के नीचे गड्ढे थे काले 
कटी थी उसकी एड़ियां और उसके नाज़ुक हाथों पे पड़े थे छाले
बस अपनी परछाईं से दूर भागने के प्रयास में 
और फिर अचानक से बस एक बार वो पाठशाला की घंटी सुनने की आस में
वो दौड़ रहा था अपनी ही धुन में होकर मगन 
शायद उसी ओर जहाँ पर वो छोड़ आया था अपना प्यारा सा बचपन 
हाँ वही बचपन जब वक़्त हमारे लिए होता था बड़ा सस्ता 
हमसे भी भारी होता था हमारे कंधे का बस्ता 
एक पेंसिल के खोने पे जो दिन भर ही थी मैं रोती
बड़ी से बड़ी गलती की सजा एक सॉरी से पूरी होती 
फिर अगर दीदी से आईस क्रीम के लिए हो जाये लड़ाई
तुरंत मनगढ़ंत शिकायत कर माँ से उसकी करवा देती थी पिटाई 
खेलने की जुंग में जब होम वर्क भी रह जाता था अधूरा 
दस बजने के बाद तो पापा सीरियल भी न देखने देते थे पूरा 
सारी मेहनत कर भी जब कक्षा में आ न पाता क्रमांक पहला 
टीचर के सामने रो-रोकर लेती थी मैं खुद को आंसुओं से नहला 
लेकिन जितने सीधे आंसू थेथी उतनी ही सच्ची मुस्कान 
बाहर की छल कपट की दुनिया से थी बिलकुल अनजान 

तो फिर क्यूँ मेरी और उस बालक कि मुस्कान में हो चला इतना फरक 
क्यूँ वह अपनी चाह की राह से हो चला इतना पृथक 
वह भी कलम थामे तो कल को डॉक्टर या इंजिनियर नहीं सकता है क्या बन 
अपने परिवार और देश की उन्नति के लिए क्या कर नहीं सकता जतन
क्या हममें से सभी, हैं नहीं इतने काबिल 
कि कर लें उस बालक को अपने पढ़े-लिखे दल में शामिल
मिलकर करें हम ये फैसला कि न हो कोई बचपन मजबूर
ऊपर उठे शिक्षित भारतन रहे कोई बाल मजदूर, न रहे कोई बाल मजदूर....

Thursday, October 16, 2014

हक़

कई ट्रेनें वहां से आई और गुज़र गई 
और उनके साथ आये और गए कई मुसाफिर 
वो लेकिन प्लेटफार्म की उसी बेंच पर बैठी थी 
उतनी ही मौन और उतनी ही स्थिर
और बोलती भी किससे कोई था भी तो नहीं उसके साथ 
पर उसे अबतक आदत पड़ ही गई थी खुद से करने की बात 

' गुड्डू को देखते ही उसे खूब सारी डाँट पिलाऊंगी 
खैर छोडो फिर उसे अपने हाथ के बने लड्डू कैसे खिलाऊँगी '
यही सोच उसने अपने हाथ में पकड़ी पोटली को सीने से भींचा 
और अपने एकमेव बेटे की छवि मन में आते ही पलकोँ को अनायास ही सींचा 

' वखत कहाँ मिलता होगा उसे, आज छुट्टी का दिन भी नहीं यूँ हड़बड़ाके आने के लिए 
इतनी तकलीफ करता ही न, पता दे देता, ज़रूरत भी न पड़ती लिबाने के लिए 
पता दे भी देता तो मैं कैसे बाँच  पाती 
पर बम्बई बड़ा सहर है, किसी को तो दिखा पाती '

दिन की चढ़ी धूप शाम के साथ गुलाबी हो गई 
और उसकी बुझती आस झुकती आँखो के साथ राज़ी हो गई 
' मुझे उठकर देखना चाहिए शायद बचपन में भी गुड्डू मेले की भीड़ में खो जाता था ...
या हो सकता है, अभी आता ही हो जैसे बचपन में छिपकर डरा जाता था '

लेकिन वो उठी नहीं ...प्लेटफार्म की उसी बेंच पर बैठी रही
बस वैसे ही जैसे बरगद का पेड़ सालो साल अपने जड़ो में सिमटी ज़मीं को जकड़े हो रख 
और करती भी क्या चौबीस घंटे में यही तो वो जगह थी जिसपर वो जमा सकती थी अपना हक़     

Friday, October 3, 2014

तू स्वतंत्र है

कहाँ गए वो वीर बहादुर जो अंग्रेज़ों से डटकर झूझे थे
और कहाँ गए वो लाल सपूत जो हर जंग में कूदे थे

क्या सारा उत्साह ठण्डाया है, और वही जोश पिघलाया है
क्यों दुर्व्यवहार पर भृकुटि तनती नहीं बस शर्म से सर झुकाया है

क्या संचारित नहीं होता अब गरम रक्त
क्यों बैठे हैं सब हम यूँ विरक्त

क्यों आँख के अंधे नयनसुख और कान के बहरे श्रवणकुमार हम
क्यों उसको दुर्बल, अबला और बेचारगी के नाम से जानें आज हम

क्यों पैदा होते ही बेटी पर लक्ष्मी की मुहर लगाते हो
पर फिर भी उसके पढ़ने से पहले उसके ब्याह की बाट जुहाते हो

क्यों किताबें - खिलोने छीन हाथ में करछी और कढ़ाई है
क्यों उसके सपनों के रंगो में यूँ सिन्दूरी रंग की स्याही है

वह रानी झाँसी की या दुर्गा बस मिसाल की ही तरह क्यों नज़र आई है
सति, अहिल्या और बन सीता क्यों हर दम अग्निपरीक्षाएं दिलवाई हैं

बस जलाने तेरे घर का चिराग
वो करे हर सपने का परित्याग

क्यों विवाह करना जैसे पूनःजन्म हो, उसकी पहचान को मिटाता है
माँ की कोख से जनम ले फिर भी संतान के नाम के आगे बस पिता का नाम जुड़ जाता है

क्यों भारत की गरिमा दहेज़ की आग में झुलसती और खुलेआम यूँ बेआबरू लटकी है
शर्मसार हो रही भारत की सभ्यता दानवता के मार्ग पर क्यों जा भटकी है

आओ मिलकर करें हम एक फैसला
दे उसे मान और स्वछन्द विहार का पूर्ण हौसला

वह महज लावण्य का प्रतीक न हो , वह तेजस्वी हो , विदूषी हो
वह महज पुरुषों के कामयाबी के पीछे नहीं उनकी हर जीत में समावेशी हो

वो किसी पर बोझ न हो , उसका जीवन भी यथार्थ हो
वह कोई दया का पात्र न हो , वो सक्षम हो , समर्थ हो

उठो भारत के नौजवानो हमें हिन्द की हर बेटी को बचाना है
हर घर की बेटी को कर सुखी, हमें भारत माँ को हँसाना है

और रहे हम तब तक प्रयत्नरत जब सूर्यास्त से न डरे कोई बेटी
और उसके माता-पिता ये न सोचे वो अबतक घर पर क्यों न लौटी

अब सहम न..... उठ खड़ी हो , पैरों की बेड़ी खोल और चुप्पी का ताला तोड़
जा विचर कर नील गगन में और बादलों से रिश्ता जोड़ .......

ऐसा रिश्ता जोड़ जैसे पिंजरे से छूटे हुआ कोई कैद परिंदा
और तेरी चहक की गूँज सुन कैद करने वाला भी हो शर्मिंदा … कैद करने वाला भी हो शर्मिंदा …… !!

Wednesday, July 16, 2014

मजबूरी

कौन है तू, तेरी क्या है पहचान ?
तू है इस देश का सार्वजनिक कूड़ादान !
तू वही  है जिसके नाम से सरकार योजनाएं करती हैं जारी
तू देता है योगदान, देश की बढ़ाने में बेरोज़गारी
तू अखबारों की सुर्ख़ियों में छाया रहता है
कभी ठण्ड में सिकुड़ कर मरता है तो कभी बाढ़  के पानी में बहता  है 
तू ही किसी मिलावटी सामान की इमारत के नीचे दबा कुचला जाता है
महंगाई जैसे बढ़ती है , भुखमरी का पहला थप्पड़ तू ही खाता है
तेरे ही हाथ में तलवार और बन्दूक थमाए जाएंगे
और साम्प्रदियिकता के कई रंग तेरे माथे लगाये जाएंगे
तू मेरी देश की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा है
संसद की चलती सभा भंग करने और बंद चाय की दूकान चालू करने के लिए सबसे सनसनीखेज किस्सा है
हाँ तू मेरे गरीब देश की व्याख्या में ढाला गया एक आम इंसान है जिसका पेशा है मजदूरी
जिसे आटे - दाल से भी अधिक महंगी पड़ती है मजबूरी …


Thursday, October 3, 2013

कुछ पंक्तियाँ ऐसे ही....


१ .बड़ी देर से बहुत तेज दौड़ रहे थे,
तो सोचा मंजिल को पा गए.
न जाने कैसा रास्ता चुना हमने
नज़र उठाकर देखा तो पाया
शून्य से चले थे फिर शून्य पे आ गए !!



२ . जिन्होंने फूलों पे ही कदम रखे हों, उन्हें तो कंकड़ भी लगते हैं शूल ..
और जिन्होंने चलना ही काँटों पे सीखा हो, उन्हें पत्थर भी लगते हैं फूल !!



३ .आसमान की तरफ देखा तो सब कुछ पंख लगा कर रहा था उड़
नज़र ज़मीन पर घुमाई तो पाया उस तूफ़ान में मेरा भी घर गया था उजड़ !!



४ .देखती थी जब भी मैं अपनी तकदीर
कोरी दिखती थी तेरे नाम की लकीर
मैं भी क्या उस ऊपरवाले को रहती कोस
या करती ऐसी तकदीर पर अफ़सोस
तेरे नाम की इस दिल पे कुछ ऐसी की थी मैंने लिखाई
कि हर दावात की खत्म हो गई थी स्याही.



५ . स्याही की जबान से एक आह सी थी निकली
उठी कलम तो तेरी यादें अलफ़ाज़ बन उतरी
तूने मुझे भुलाने की कोशिश में कई दिन होंगे काट
पर तेरे ही नाम के सहारे मेरी कई रातें हैं गुजरी...



६ . उनसे मांगी हमने थोड़ी सी ज़मीन बेघर न होने के लिए
दे दी दो फुट ज़मीन के नीचे आराम से सोने के लिए



७ . जो दूसरों के लिए घर बनाते हैं
वो अक्सर बिना छत के सो जाते हैं



८ . जब हुआ हमें इनकार से इकरार
तब करने लगे हम नफरत से भी प्यार
भीड़ में पाया जब खुद को अकेला
तो हमने भी कर लिया बेकरारी से करार



९ . दूर उस कुटिया में कुछ ख़ुशी है मनाई
बहती हवा में कुछ सूखी टहनियां बौराईं
न छोड़े है ये राग , न छोड़े ये इस काल में गाना
कैसे समझाएं इस पगली अकेली को- अभी दूर हैं सजना !!!



१० .जिन्हें कल तक मेरी मौजूदगी का इल्म न था
वो आज मेरे हमदर्द बनने का रखते हैं चाव 
जिन जख्मों का लहू सूख चूका था 
मरहम लगाने के बहाने फिर कुरेदते हैं मेरे वही घाव 




११ . मेरे जीवन में कुछ कमी का एहसास है 
जैसे साये को किसी ढलती रौशनी की प्यास है
मेरे आँखों में भी दिखती कोई आस है 
जैसे किसी अक्स को अपने आईने की तलाश है 




१२ . लगता था मुझे पहाड़ों से गूंजने वाली हर चीज़ हो सकती है केवल शोर...
पर टूटा मेरा भ्रम जब जाना मेरे ही खामोशियों का सन्नाटा गूँज रहा था सभी ओर




१३ . तुझे क्या लगता है ये गहने तेरी खूबसूरती बढ़ाते हैं
ये तो तुझपर सजकर खुद सुन्दर होने का एहसास पाते हैं...




१४ . क्यूँ मुझे इस अनजान शहर में यूं अकेले है छोड़ा 
या तो छोड़ देते, या ले जाते, लगता है मुझे बाँट दिया है बस थोड़ा थोड़ा.




१५ . सच्चा रहा बहुत हम दोनों का ही इश्क 
तू पीता रहा रंगीन पानी और मैं पीती रही अश्क 




१६ . मैं तेरी जीवन किताब का एक मामूली किस्सा हूँ 
न ही मैं प्रस्तावना न ही मैं किसी निष्कर्ष का हिस्सा हूँ 
मैं बस पिछले पन्ने से अगले पन्ने की कड़ी का जोड़ हूँ 
एक सड़क से दूसरी सड़क को जोड़ने के लिए बनाया एक मोड़ हूँ
ये पन्ना न भी हो तो किताब नहीं लगेगी अधूरी 
इस अधकचरे पन्ने के बिना भी होगी उतनी ही पूरी 
इस पन्ने पर ज्यादा वक़्त खर्चो न इसे जल्दी से उलटो 
आगे कई रंगीन पन्ने पड़े हैं इसे जल्दी से पलटो, जल्दी से पलटो ...




१७ . पिंजरे में कैद परिंदा था 
न जाने कैसे वो जिन्दा था
खुलते ही पिंजरा पंछी यूं चहका 
कि कैद करने वाला भी शर्मिंदा था ..




१८ . मैंने ये बात तो तुझसे कभी कही नहीं 
कि बिन तेरे मैं कभी रही नहीं 
नापनी थी मुझे सागर की गहराइयाँ 
फिर क्यूँ किनारे पर मैं खड़ी रही ...




१९ .साकी की तलाश में हम मधुशाला घूम आये 
मदिरा मिली नहीं तो बिन पीये ही झूम आये 
फिर उसकी आँखों में जब छलकता देखा मयखाने का प्याला 
उसकी एक ही नज़र ने मुझे बेसुध था कर डाला 




२० .उसने मेरे सब्र को बुजदिली का नाम दे डाला 
समझा ही नहीं महफ़िल में यूं बदनाम कर डाला 
यूं तो हम खामोशियों से कई लोगों को मार देते 
पर उसके एक जिक्र ने मुझे मेरा ही कातिल बना डाला 




२१ .जब से तारों से जुडी ज़िन्दगी 
बाकी सब से बेतार हो गई 
जब टूटे तारों को जोड़ना चाहा 
मेरी ही जिंदगी तार तार हो गई 




२२ . साथी नहीं बना सकते तो क्या गम 
कम से कम परछाईं तो रहने दो 
खुशियों की बारिश में भिगो नहीं सकते तो क्या गम 
कड़ी धूप में साथ रहने दो ...




२३ . एक गुलाब को खुशबू बिखेरने से ही रोका है 
कैसा नसीब मिला है अपने ही काटों से मुझे धोखा है ..




२४ . मुस्कुराने की ऐसी आदत लगी थी कि आंसुओं से होती है उलझन
अक्स किसका है ये सोचने लगती हूँ,  जब माथे पे दिखती है शिकन 
 इसलिए अब  मैं बंद कमरे में अकेले जोर जोर से हंसती हूँ
और अपने ही बुने हुए इस जाल में हर रोज थोडा और फंसती हूँ 




२५ . सब के ख्वाबों के आशियाँ में रंग भरते भरते,
मैं अपने टूटे मकान के टुकड़े न जोड़ पाई
हर एक की जश्न-ऐ -महफ़िल में इस कदर मदहोश हुई
की अपने ग़मों पे एक आंसू भी न बहा पाई .....




२६ . आज मेरे शहर की हवाओं का रुख बदल गया बेवक़्त …
अमीर के चेहरे से उड़ा पसीना, और गरीब के सर से छत ....




२७ . ये कैसा ईमान है जो मासूमों को करता है लहू-लुहान
मैं ता-उम्र रहना चाहूंगी बे-ईमान ……
गर मौजूद होता खुदा तो वो भी करता फ़रियाद
मत कर मेरे नाम से ऐसा मजहब इज़ाद ....  




२८ . उन्हें मेरी हिफाज़त करना खूब आता है
चार दीवारों में समेटकर ....
 इसलिए मैं शब्द भी समेट के रखती हूँ …
 कहीं बेपरवान न हो जाये ....



२९ . सिलवटें , जो बिस्तर पे पड़ें तो सोने न दें 
जो माथे पे पड़ें तो खुश होने न दें ...... 




३० . उस परवरदिगार की इबादत के मुख्तलिफ तरीके हैं 
न भूलें उस तालीम को जो हम अपनी पाठशाला में सीखे हैं 
किसी एक खुदा का घर जलाकर, दूसरे खुदा के ज़िंदाबाद के नारे लगाएंगे 
ये खून से सने हाथ लेकर कौनसे खुदा को हम अपना मुँह दिखाएंगे 
गर हम अपने भीतर के ईमान के बदले सिर्फ अहम् को हवा देंगे 
नागरिकता तो फिर भी बचा लेंगे हम, इंसानियत ज़रूर गवाँ देंगे !




३१ . ​किसी और की ज़िन्दगी लगे बेज़ार और सस्ती 
इतनी बड़ी नहीं किसी मजहबी की हस्ती




३२ . आज भी मेरा कुछ अक्स  तुझमे बसता है 
मैं आहें भरती  हूँ, तब वो अक्स  हँसता है 
सोचा था मिलकर तुझसे मांग लूंगी अपने आप को 
लेकिन फिर देखा, बिन उसके तू कुछ अधूरा लगता है ......




३३. ​नफरत करने के बहाने फिर तुम से छुप छुप के प्यार हम करते रहे.
तुम जता नहीं सके, इसलिए तुम्हारे आंसू हम अपनी आँख में भरते रहे...




३४. मैं घर में रोज़ाना ताला लगाता रहा उसे बाहरवालों से सुरक्षित रखने के लिए 
एक दिन अचानक ही तूफ़ान  आ गया, अब छत ही नहीं रही सर ढकने के लिए !

Thursday, September 19, 2013

फूलों की बगिया



एक दिन फूलों वाली बगिया में चल रही थी कोई क्लास
सारे फूल बता रहे थे अपने जीवन का कुछ हेतु ख़ास
कहा एक ने 'मैं हूँ सदभावना का प्रतीक, जब मिलते हैं मुझसे अनेक
जुड़ जाता हूँ बंधन में और माला में बनकर रहता हूँ में एक'
दूजे ने कहा 'मैंने तो सीखा है बस जीवन में करना अर्पण
अपने जीवन को धन्य कर मैं तो छूता हूँ प्रभु के नित चरण'
तीसरा कुछ शरमाया, पहले थोडा हिचकिचाया
फिर बोला 'दो प्रेमोयों के प्यार को मैंने ही तो है बढ़ाया'
दूर लगा वो फूल बोलने के लिए ढूंढ़ रहा था कुछ वक़्त सटीक
महिलाओं के केशों में तो सजकर मैं बनता हूँ सुंदरता का प्रतीक
फिर उस महकते पुष्प ने कुछ अपनी छाती फुलाई
वीरों के पथ पर शयन करने की हमने तो कसम है खायी
एक फूल कुछ थोडा दुखी था,कुछ दिख रही थी उसकी लाचारी
मृत देहों पर सजकर रहना था, था उसका दुःख कुछ भारी
लेकिन उन सब पुष्पों में से था एक पुष्प बिलकुल मौन
सब पुष्पों ने मिलकर पूछा, आखिर ये है कौन
क्या तुम्हारे जीवन का कुछ हेतु नहीं है भाई
बाकी सब दोस्तों ने तो है अपनी जीवन गाथा बतलाई
'हूँ तुममें से ही एक दोस्तों, मैं करता हूँ खुशबू का प्रसार
मुरझाने के बाद मेरी पंखुड़ियाँ करें नए जीवन का संचार
अपने जीवन में रहते हर भंवरे को करवाऊंगा मधु रस का मैं पान
फिर समय पूरा होने पे सौपूंगा किसी और को जीवन का वरदान'
इसी तरह किया उस फूल ने अपने सभी दोस्तों का गुण-गान.

Monday, August 26, 2013

बंटवारा

आज घर का बंटवारा करना था, बांटना था उन्हें अपना सारा सामान
पर सोच में खड़े थे दोनों , कैसे बँटता उनके सर के ऊपर का खुला आसमान ...
कैसे हिसाब होता कौनसी हँसी तेरी थी या थी मेरी
और कैसे लगता हिसाब की किसने किसके लिए कितनी नींदें थी वारी ..
कैसे बँटता वो वक़्त जिसकी अनमोल थी कीमत
और कैसे बँटता वो जहाँ जो दोनों की बाँहों में था सीमित
हाँ वैसे तो सारा सामान बँट चूका है बस कुछ बिखरे पल हैं बाकी
सोच में खड़े हैं दोनों , सर के ऊपर का खुला आसमान अब भी है बाकी .....