Friday, August 16, 2019

The way

I am walking pass my lonely way

Hoping to see some gleaming ray

In the evening sky, the flocks flutter back to home

At this point of hour, I wonder why do I roam

My ardent eyes paint the picture of a lovely spring

With every night, I dream of the bright morning

I long to hear the distant temple chime

And I long to accelerate this nightly time....

But I open my eyes to see all is dead and still

There is more time to reach my home, downhill...

Thursday, February 7, 2019

यादें


एक वक़्त था जब हम साथ रहकर भी कभी नहीं थकते थे
जब भी मौका मिले बिना कुछ सोचे, जो मुँह में आये वो बकते थे
न शब्दों पे पर्दा था, न कोई थी विचारों में रुकावट
हँसी  हो या रुलाई उसमें औपचारिकताओं की नहीं थी दिखावट
आज का वक़्त बदला है ..
कल ही किसी पुराने दोस्त से बात करने को मन चाह रहा था
सीधे कॉल ही करते हैं दिल में था, पर दिमाग पहले अपॉइंटमेंट लेने को मना रहा था
बहुत सोचने के बाद, व्हाट्सएप्प पे एक छोटा सा पिंग कर दिया
उसने व्हाट्सएप्प का जवाब देने के लिए अगला दिन ही कर दिया
इनकी छोड़िये ..
कुछ दोस्त तो इतने तल्लीन हैं, उनके मैसेज का रिप्लाई भी नहीं आता
भूले-बिसरे आ भी जाये तो बात करने की इच्छा है, ऐसा इज़हार नहीं आता
आपने इन्हें याद करके फ़ोन किया होगा, फ़ोन नहीं  उठाया उस वक़्त ये समझ भी लें आप
लेकिन गलती से भी महीनों, सालों बाद भी कभी इनका कॉल-बैक नहीं आता
सोचा पहले बहुत आसान था :
सायकल की घंटी बजाते थे, दोस्त खेलने का इशारा समझ जाते थे..
कॉलेज के लास्ट पेपर  के बाद कौनसी पिक्चर देखेंगे, वो ग्रुप स्टडी के वक़्त ही तय कर जाते थे..
इन्हीं दोस्तों के साथ आपने कभी अपना टिफ़िन खाया होगा
इन्हीं के साथ सायकल पे कभी रेस लगाईं होगी
शायद इनके साथ बैठके कई अनकही, अनसुनी कहानियां और किस्से छुपाये होंगे
इनके साथ रात रात को बैठकर नोट्स किसी की नक़ल कर उतारे होंगे
लेकिन आज का वक़्त बदला है..
आज ये अपनी दुनिया में व्यस्त हैं
अपने आप में सभी मस्त हैं
वक़्त बदलता है तो ज़रूरतें भी बदलती हैं
आप की जगह कई और शख्सियत ले लेती हैं
पर इस भागती दुनिया में ज्यादा अपेक्षाओं के बंधन में न बाँधूँगी दोस्त
पर जब कभी अपनी तुम्हें लगे, ज़िन्दगी हो गई है अस्त व्यस्त
तब कभी याद करके देखना ...
दिल खोलके बात करके देखना ...
तुम्हारी सारी यादें मुस्कुराहटें, किस्से कहानियां, अब भी दिल के कोने में महक रहे हैं गुलदस्ते की तरह
फुर्सत मिले तो चले आना उन यादों में, फिर तफरी करेंगे बीते दिनों की तरह 


Monday, September 3, 2018

कुछ पंक्तियाँ ऐसे ही.... II


इस जबाब का सवाल कहीं खो गया है
हो सके तो दोबारा उठाना
कोशिशें तो कई चीज़ों की करी हैं आपने
हो सके तो फिर अपनी कलम को उठाना ......

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मैं तो निकली थी घर से तुम्हारे पास आने के लिए
पर मेरे कदम के दायरे उनके सवालों के दायरे से छोटे थे।
रस्ते के झींगुर और पपीहे से तो बचकर आ जाती 
पर उस भूरे काले बादल को मैं क्या मुँह दिखाती? 

मैं तो यही सोचती रही ..मुझे जाने ही क्यूँ दिया ,
रोक लिया होता उस दिन भी जैसे हर बार पकड़ के रोक लेते थे…. 
बस थोडा आनाकानी ही तो करती 
पर कुछ देर में मान ही जाती 

फिर तुम्हारे पास तो जलाने को सिगरेट भी थी,
 मेरे पास तो बस दिल था ....
वो तो कब का तुम्हें दे आई थी .....

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Monday, January 1, 2018

आगाज़

जैसे कलियों में छिपा है फूलों के महकने का अंदाज़,
जैसे नन्हे परों के ही बीच छिपा है चहकने का अंदाज़,
जैसे अंकुरों में हो कैद उस पेड़ के फलने फूलने का राज़,
जैसे सुबह कि पहली किरण को है अँधेरा भगाने पर नाज़,
जैसे हर किलकारी में गूंजता है मोहक हंसी के गीतों का साज,
जैसे उस अदनी सी बूँद को मिला है घट भरने का काज,
बस उसी तरह इन तस्वीरों को सजायेंगे कुछ चंद अलफ़ाज़
हमारी इस अदनी सी कोशिश से करते हैं हम इस संकलन का आगाज़ !!

Friday, May 26, 2017

प्यार है ....

प्यार है मुझे तुम्हारे गुस्से से, झुंझलाहट से, 
तुम्हे चौंका देने वाली उस रेल गाड़ी की आहट से..
प्यार है मुझे तुम्हारे आँखों के आंसुओं से,
माथे से टपकती हुई उन पसीने की बूंदों से..
तुम्हारे केशों में सजते हुए उस रूपल ताज से, 
तुम्हारी वक़्त बेवक़्त की खांसी में छिपे हुए साज़ से...  
प्यार है मुझे तुम्हारे डर से, तुम्हारी चिंता से , तकरार से,
मुझसे खुल के बेहिचक किए गए उस इनकार से..
प्यार है मुझे तुम्हारी माथे पर पड़ती सिलवटों से,
रात - बेरात तुम्हारी उन बेचैन करवटों से.. 
है प्यार मुझे तुम्हारी हर उस कमी से जो तुम्हें  'तुम' बनाती हैं  
क्यूंकि तुम्हारे होने से ही ये मुझे 'हम' बनाती हैं।  

Friday, August 7, 2015

मुखोटे


            ये कैसी मेरी भाषा है ये कैसी परिभाषा है
        क्यूँ मेरी हर निराशा में ये छिपी निरी आशा है
        क्यूँ जलने के बाद भी कोई ठंडक को न पाता है
         क्यूँ जीतने के बाद भी कोई हार ही को पाता है
    क्यूँ किसी अनजान में जान का अक्स नज़र आया है
      क्यूँ गिरने का भाव भी उस गिरी से लगता आया है
     क्यूँ होती है वो स-रिता फिर भी बहती चली आती है
        क्यूँ होता है जब सोना तब नींद ही न आती है
क्यूँ हिंसा के भीतर इन्सां दिखता है, क्यूँ दिखे है वानर में नर
क्यूँ दान में आन होना जरूरी है, क्यूँ जरी में भी दिखता है जर
     क्यूँ हम अपने वतन के वास्ते तन नत न कर पाते हैं
   सोचते हैं जीवन है क्या तो बस जीवों के वन को ही पाते हैं
     कैसा  है जगत प्रिया यहाँ मूल्यों के मूल इतने छोटे हैं
     कैसे ढूदे मानव यहाँ ओढ़े खड़े कितने मु-खोटे हैं  ...!!

Friday, July 31, 2015

बुद्धिजीवियों का खुदा

​हर नाइंसाफी के खिलाफ कदम उठाना ​यही सिखाया था न दुनिया का कायदा
पर काँप रहे थे दो हाथ जो सोच रहे थे कि उसे कलम थामना सिखाने का क्या हुआ फायदा 
वैसे तो मेरी इस कड़वी रचना का भी नहीं है कोई ख़ास फायदा
पर मेरी दो आँखें कल रात सोच रही थी कि चुपचाप नीर बहाने से भी नहीं कोई फायदा
तो चलिए मार्किट में एक नया खुदा लांच हुआ है …आइये वाकिफ होते हैं इन्से… ​


वो कागज़ के कई सफ़ेद चमकदार पन्नो को
घुमावदार नक्काशीदार अक्षरों से सजा रहा था
स्याही में सनी अपनी सुडौल उँगलियाँ से
मेज पर विजयी तबला बजा रहा था

वैसे क्या थी आज की विजय गाथा, शीर्षक था-
कैसे धर्म से भारत अधर्म के रस्ते को है जाता
हाँ वैसे उसे इस बात से दिक्कत नहीं
कि धर्म मौजूद है या नहीं
या फिर दुनिया में खुदा मौजूद है या नहीं

पर खुदा किस रंग या रूप का है ये बात पता करना ज़रूरी थी
अगर कोई सनसनीखेज - वंचित - पीड़ित - अबल खुदा को याद करे
और फिर भी ख़ुदा न सुने तो खुदा की ऐसी क्या मजबूरी थी..

पर एक मिनट ठहरो …… वो तो नास्तिकता के ख़याल को रखता था आबाद 
हाँ, इसलिए तो अब नास्तिकों के लिए नए धर्म को कर रहा है न इज़ाद
इस धर्म का पालन हर पढ़ा-लिखा बुद्धिजीव व्यक्ति करेगा
जो नहीं करेगा वो उसे कम अक्ल होने की उपाधि दे देगा
इस तरह वह अपनी कलम के बल से हर तरह के गरीब और हर प्रकार के दुखियारे की
बौद्धिक और भावनात्मक भूख को शांत करेगा .......
फिर वह साहसी, विद्वान,जुझारू और जागरूक कहलाएगा
बस एक बार यह नया धर्म चल जाए , बुद्धिजीवियों का खुद-आ भी कहलाएगा





Saturday, May 23, 2015

जनमदिन



कल मैं पूरे बारह बरस की हो जाऊँगी। 
कल से मैं भी दीदी की तरह सायानी कहलाऊँगी। 
अम्मा इसी दिन के इंतज़ार में थी 
बाबा न जाने क्योँ  दिखते  हैं दुखी !
खेत पर जाना तो है उनको 
पर बेर बेर खोलके देखते हैं सन्दूकी। 
बाबा कहते हैं मुझे अबसे पाठशाला नहीं जाना पड़ेगा 
पर माट साहब तो कहे थे गणित न दिखाए कल तो डंडा पड़ेगा 
सोचा निम्मी के हाथ से कापी भिजवा दूँगी जब खेलने जाऊँगी 
पर अम्मा कहती हैं वो संजा बखत में मुझे दाल चावल बनाना सिखाएंगी 
बाबा ने मेरे जनमदिन पे दो दो साड़ियां लाई  हैं 
अम्मा ने तेल लगा के कस के चुटिया बनाई है 
अम्मा-बाबा कहते हैं मेरे लिए उन्होने एक रिश्ता किया है मंजूर 
अगले महीने बिया है मेरा, आइएगा जरूर …… 

Sunday, March 29, 2015

No, not today....

No, not today....
I dont wanna look amazing every single day...
Why is it I need to tie my hair neat and tidy 
Why is it I need to wear my cotton churidaars all wrinkle free
No, not today 
I just wanna let my hair down today
and love my shabby pyjamas till the end of the day...
Please dont expect me to cook the best of the meal..just today
Please lemme drive my scooter for a looong ride on my own way..
I dont wanna come home till the sun goes down to sleep
Please lemme forget all those promises and pride which I ought to keep..
Lemme drink, eat and dance....and just let me sing those songs....
Please dont judge me today by my words and forget all my wrongs....  
Lemme not keep waiting for trifle joys in the shroud of sorrows...
Please give me my today so that I no more long for tomorrows...

Friday, November 14, 2014

बचपन

         

वह अनमना सा बुझा बुझा चला जा रहा था
और माथे से पसीने की कुछ बूँदें टपका रहा था
क्या सचमुच गोदाम में पड़ी वो बोरियां थीं इतनी भारी 
या इससे भी बोझिल उसके नन्हे कन्धों पे थी कोई ज़िम्मेदारी
सूखे से होंठ हो चुके थेऔर आँखों के नीचे गड्ढे थे काले 
कटी थी उसकी एड़ियां और उसके नाज़ुक हाथों पे पड़े थे छाले
बस अपनी परछाईं से दूर भागने के प्रयास में 
और फिर अचानक से बस एक बार वो पाठशाला की घंटी सुनने की आस में
वो दौड़ रहा था अपनी ही धुन में होकर मगन 
शायद उसी ओर जहाँ पर वो छोड़ आया था अपना प्यारा सा बचपन 
हाँ वही बचपन जब वक़्त हमारे लिए होता था बड़ा सस्ता 
हमसे भी भारी होता था हमारे कंधे का बस्ता 
एक पेंसिल के खोने पे जो दिन भर ही थी मैं रोती
बड़ी से बड़ी गलती की सजा एक सॉरी से पूरी होती 
फिर अगर दीदी से आईस क्रीम के लिए हो जाये लड़ाई
तुरंत मनगढ़ंत शिकायत कर माँ से उसकी करवा देती थी पिटाई 
खेलने की जुंग में जब होम वर्क भी रह जाता था अधूरा 
दस बजने के बाद तो पापा सीरियल भी न देखने देते थे पूरा 
सारी मेहनत कर भी जब कक्षा में आ न पाता क्रमांक पहला 
टीचर के सामने रो-रोकर लेती थी मैं खुद को आंसुओं से नहला 
लेकिन जितने सीधे आंसू थेथी उतनी ही सच्ची मुस्कान 
बाहर की छल कपट की दुनिया से थी बिलकुल अनजान 

तो फिर क्यूँ मेरी और उस बालक कि मुस्कान में हो चला इतना फरक 
क्यूँ वह अपनी चाह की राह से हो चला इतना पृथक 
वह भी कलम थामे तो कल को डॉक्टर या इंजिनियर नहीं सकता है क्या बन 
अपने परिवार और देश की उन्नति के लिए क्या कर नहीं सकता जतन
क्या हममें से सभी, हैं नहीं इतने काबिल 
कि कर लें उस बालक को अपने पढ़े-लिखे दल में शामिल
मिलकर करें हम ये फैसला कि न हो कोई बचपन मजबूर
ऊपर उठे शिक्षित भारतन रहे कोई बाल मजदूर, न रहे कोई बाल मजदूर....