कर लो मुझे इंसानों में शामिल कि मुझे ईश्वर का न यूँ दो दर्ज़ा
मत चढ़ाओ मुझपर इतने चढ़ावे कि इसका मैं कभी उतार ही न पाऊँ कर्ज़ा
मत करो सब मिलकर इतने तकादे कि एक गुहार भी मुझ तक न पहुँचे
क्यूँ चलकर दिखाते हो कँटीले रास्तों पे इस तरह, मैं थककर अपनी आंखें था मींचे
मत करो खुद को मूर्ख जाहिर और मुझे सर्व ज्ञानी होने का थमाओ ये बेमानी खिताब
हर एक के सुख-दुःख और परेशानी का मेरे ही मत्थे क्यूँ मढ़ते हो सारा हिसाब
हर ख़ुशी मनाते वक़्त तुम्हें याद आता है अपना घर, दोस्त और परिवार वाला
और ग़मों के वक़्त मेरा साथ चाहिए, क्या हूँ जैसे मैं कोई हाला ....
मेरे लायक कुछ और करने के लिए न बचा तो मुझे दे दिया सृष्टि रचयिता का सम्मान
जानता ही कौन है, मैंने तुझे बनाया है या तूने अपने स्वार्थ के लिए किया है मेरा निर्माण
काश मुझमें थोड़ी सी इंसानियत की तूने छोड़ी होती गुंजाईश
तो दिल खोलकर मैं भी कहीं कर रहा होता कोई तो फरमाइश
इसलिए मुझे तू इंसान ही बना दे,हो जिसमें हाड-माँस और स्पंदन करता गरम रक्त
न ही बनना मुझे तेरा भगवान, कर दे मुझे इस दैविकता से मुक्त, इस दैविकता से मुक्त.....
Sahi priyanka
ReplyDeletekeep it up
very good take on so called religion!! best line..`जानता ही कौन है, मैंने तुझे बनाया है या तूने अपने स्वार्थ के लिए किया है मेरा निर्माण` !!!
ReplyDeleteवैसे इनसे कहिये कि `आप कतार में हैं, कृपया प्रतीक्षा कीजिये` !!! क्यूंकि अभी तो आदमी को भी इंसान बनना कहाँ मयस्सर हुआ है!! ( last line `inspired` by Ghalib!! )
ReplyDelete