Monday, December 10, 2012

आखरी हसरत




 न जाने कितने बरसों से सूनी पड़ी थी उसकी फुलवारी
टूटा घर का सन्नाटा, उसके घर में भी गूंजी एक किलकारी
ओझल हो जाती चेहरे की शिकन, दूर हो जाती सब थकान
चेहरे पे जब भी देख लेती वो अपने प्यारे की मुस्कान

याद है उसे आज भी वो दिन जब उसकी ख़ुशी का कुछ ठिकाना था न रहा
अपनी प्यारी तोतली जबान में जब उसने पहली बार माँ था कहा
उसी माँ का हाथ थामे उसने अपना पहला कदम था बढाया
उसी माँ ने तो उस दुलारे को हाथ में कलम थामना था सिखाया
कितने बार टूटे होंगे क्रिकेट की गेंद से पड़ोसियों के खिडकियों के काँच
लेकिन सबसे लड़ लेती वो, न आने देती अपने बेटे पर कोई आँच
न जाने कितनी बार होमेवोर्क न होने पर उसकी कॉपी थी घर पर वापिस आई
काम क्यूँ नहीं करता तुम्हारा दुलारा शिक्षक ने मांगी थी सफाई
फिर कभी गलती न करना ये कसम भी तो थी उसी ने दिलाई
इसी शर्त पर तो ये बात दुलारे के पापा से थी छिपाई
यही सब याद करते छा जाती है उसकी आँखों में नमी
दुलारा हो चला है इंजीनियर उसे रही नहीं किसी बात की कमी

अपनी मर्ज़ी से उसने अपना नया परिवार है बसाया
अपनी काबिलियत से उसने शोहरत और नाम है कमाया
तरक्की ऐसी की सब दूना हो गया, घर भी एक के दो हो चले हैं
माँ के साथ एक छत के नीचे रहना ऐसे रुढ़िवादी विचार क्या लगते भले हैं !
घंटे घंटे फ़ोन के पास बैठी रहती वो, कभी तो बेटा फ़ोन करेगा
यूहीं दरवाजे के सौ चक्कर लगाती, कभी तो राह भूल यहाँ से गुजरेगा
इसी तरह कट रही थी उसकी अनगिनत सुबह और शाम
न कभी बेटा घर का रास्ता भूला, न ही कभी आया कोई पैगाम

एक रोज़ बेटे के पास किसी शुभचिंतक का फ़ोन था आया
माँ  बीमार हैं तुम्हारी- मिल जाओ, ये संदेसा था भिजवाया
बेटा बुदबुदाया, 'न जाने माँ क्यूँ करती हैं फ़ोन बार बार
शायद पैसे चाहिए, ये सोच भिजवा दिए कुछ हज़ार
बेटा अनजान था, शायद इतनी लक्ष्मी तो माँ के घर में भी थी बरसती
लेकिन फिर भी उस माँ की आँखें अपने बेटे की एक झलक के लिए थी तरसती
बीत गए दिन बीते महीने पर उसे मिल न पाई इतनी फुरसत
कि कर आता पूरी अपनी माँ कि वो आखरी हसरत, आखरी हसरत !!

Friday, November 30, 2012

मुझे इंसान बना दो....


कर लो मुझे इंसानों में शामिल कि मुझे ईश्वर का न यूँ दो दर्ज़ा 
मत चढ़ाओ मुझपर इतने चढ़ावे कि इसका मैं कभी उतार ही न पाऊँ कर्ज़ा 

मत करो सब मिलकर इतने तकादे कि एक गुहार भी मुझ तक न पहुँचे  
क्यूँ चलकर दिखाते हो कँटीले रास्तों पे इस तरह, मैं थककर अपनी आंखें था मींचे 

मत करो खुद को मूर्ख जाहिर और मुझे सर्व ज्ञानी होने का थमाओ ये बेमानी खिताब
हर एक के सुख-दुःख और परेशानी का मेरे ही मत्थे क्यूँ मढ़ते हो सारा हिसाब 

हर ख़ुशी मनाते वक़्त तुम्हें याद आता है अपना घर, दोस्त और परिवार वाला 
और ग़मों के वक़्त मेरा साथ चाहिए, क्या हूँ जैसे मैं कोई हाला ....

मेरे लायक कुछ और करने के लिए न बचा तो मुझे दे दिया सृष्टि रचयिता का सम्मान 
जानता ही कौन है, मैंने तुझे बनाया है या तूने अपने स्वार्थ के लिए किया है मेरा निर्माण 

काश मुझमें थोड़ी सी इंसानियत की तूने छोड़ी होती गुंजाईश 
तो दिल खोलकर मैं भी कहीं कर रहा होता कोई तो फरमाइश 

इसलिए मुझे तू इंसान ही बना दे,हो जिसमें हाड-माँस और स्पंदन करता गरम रक्त 
न ही बनना मुझे तेरा भगवान, कर दे मुझे इस दैविकता से मुक्त, इस दैविकता से मुक्त.....

Tuesday, November 27, 2012

शिक्षा

हमने बचपन की शुरुवात से ही उसे हर चीज़ में अंतर समझना था सिखा दिया।
हर काला सफ़ेद से अलग है, ये रंगों का भेद उसे दिखा दिया ।
हर अंक के मायने एक दूजे से अलग हैं, ये ज्ञान भी उसे रटा दिया ।
हर छोटा बड़े से अलग होता है, ये रचनाओं का भेद भी उसे बता दिया ।
पता नहीं कौन मूर्ख कहता है कि शिक्षा सबको समान  करती है
कल उसने जब इंसानों के बीच भेद किया तो हमने उसपर साम्प्रदायिकता का ठप्पा लगा दिया .... 

Wednesday, May 30, 2012

चंद्रग्रहण

    

                        
                                  एक रोज़ आकाश के सारे सितारे हो गए दंग
                                 सूरज और चाँद में छिड़ गयी कुछ अजब सी जंग
                               कौन ज्यादा अनोखा है और किसके निराले हैं अंदाज
                                     वही पहनेगा आज खूबसूरती का ये ताज
                      पृथ्वी माता पहुंची दोनों को लड़ने से रोक, बढ़ाने उनका हौसला
                    तो फसी ऐसी मध्यस्त कि निर्णायक बनकर करना पड़ा इन्हीको फैसला
                                    पृथ्वी के सामने ये समस्या थी बड़ी जटिल
                               दोनों पक्षों ने पेश करना शुरू की अपनी अपनी दलील

दिन की शुरुवात मुझसे ही होती है, हूँ में ऊर्जा देने में दक्ष
मेरे बिन न जीवन होगा, कह सूरज ने रखा अपना पक्ष

                                             न होता मैं तो निद्रा देवी कैसे आँखों में बसती
                                              बिन चाँद के आगमन से कैसे सूरज की आग पिघलती

बोला सूरज न होता मैं तो ये पौधे युहीं भूखे मर जाते
बिन मेरे तो ये बादल भी पानी नहीं बरसाते

                                            हो तुम क्रोध के प्रतीक, तुम ही पृथ्वी के जीवों को हो झुलसाते
                                          न होता मैं चाँद इतना सुन्दर तो मुझपर इतने गीत न लिखे जाते

                     ये सुन जब सूरज आग बबूला हुआ और न पाया अपना गुस्सा संभाल
                       तभी पृथ्वी बनकर आ गई चाँद सूरज के बीच में बनकर एक ढाल
                         इसी तरह सूरज के क्रोध से पृथ्वी ने चाँद को बार बार है बचाया
                            आकाश के इसी नज़ारे को हमलोगों ने 'चंद्रग्रहण' है कहलाया


Tuesday, May 15, 2012

एहसास

                               

कल सुबह से ही मैं खुश थी, होठों की हंसी नहीं रही थी थम,
महीनों का वादा पूरा होना था आज, आज था सिनेमा जाने का कार्यक्रम .
ढेरों काम करने हैं आज, शाम की है जोरों पे तैय्यारी
केशों की सज्जा, माथे पे बिंदी और पहनूंगी उसकी दी हुई साड़ी
सज संवर कर बैठी करूँ शाम होने का इंतज़ार
खिड़की पर बैठे मेरी नज़रें उसका रस्ता तके बार बार ...

दूर से एक परछाईं धीमी चाल में मेरी ओर बढ़ी
मेरा मन मचला- चलो आ ही गयी वो खुशनुमा घड़ी
कुछ बोझिल सा मन और आँखों में दिखी एक अधूरी आस
शायद दफ्तर कि थकान या बॉस कि फटकार ने किया था मन को उदास
उसने 'टाई' एक ओर फेकी और अपना झोला एक ओर फेका
पर अफ़सोस इस पूरे कार्यक्रम में उसने मेरी ओर एक बार भी नहीं देखा
मैं भीतर जा पानी का गिलास ले आई
गिलास थामते ही उसने नज़र मेरी ओर घुमाई
उसकी आँखों में कुछ और कसक सी उठी जाग 
मेरे चेहरे से नज़र उस कमरे के कोने में गई भाग 

न जाने कैसी कश्मकश थी उस कमरे में एक चुप्पी सी छा गयी
मुझसे किस मुह से इनकार करे, उसके मन में दुविधा सी आ गयी
बड़ी देर की चुप्पी को फिर मैंने ही खुद से तोड़ा
अपने दिमाग में चल रही कड़ियों को सलीके से जोड़ा
कहा मैंने 'इतना दूर सिनेमा देखने जाने का काम है बड़ा झंझट वाला
वैसे भी 'टीवी' पर मेरा पसंदीदा 'रिअलिटी शो' है आनेवाला
सोफे पर टिककर चाय कि चुस्की लेकर मजे से 'टीवी' देखेंगे
सिनेमा का मन नहीं हो रहा आज, उसके बारे में फिर किसी और दिन सोचेंगे '
उसके चेहरे की कुछ दूर होती दिखी थकान
तनाव के बादल कुछ हटे तो दिखी उसकी प्यारी सी मुस्कान
उसने टीवी चला दी कुछ हंसी उसके चेहरे पे थी खिली
इस सुन्दर एहसास के साथ में चाय बनाने रसोईघर में चल पड़ी ...

Saturday, May 12, 2012

Passing Cloud

Across the sky I see a passing cloud
For the bright light looking towards me creating a shroud..
It gets heavier as it doesn't rain
Efforts of the wind to shove it off go all in vain..
It gets darker with every ticking clock
The billows stare at me as if they mock..
I look up the heavens but only in despair
I just wanna have a glance of that celestial glare..
I keep pretenses to hide my fears
And feel too prudent to shed any tears...
Not yet a drop is ready to shed
Awaiting a long way yet to be tread...
Miles to go before I sleep...
And smiles to go before I weep....

Wednesday, May 9, 2012

Amidst the waves...

Stood abreast the stretched boundaries of the shore
Turbulent waves and perpetual horizons I adore...

With each surge nudging my feet
Manifesting nature's rhythmic beat

Teaching me that shallowness is full of volatility
Have to traverse more depths to achieve the eternal tranquility....

The depths engulf the celestial flamboyance
And so I contemplate the ambit of my pursuance

Do I have the competence to absorb all melancholy
And still look the same, so serene and yet so lovely....

Friday, April 20, 2012

Twinkle Twinkle revisited

Twinkle twinkle little star
I still wonder what you are...
Up above the world so high,
Like colourful diamonds you decorate the sky.

Be you near or be you far ; Be you faint or be you bright
I just feel boggled every time I gaze
With your blue,yellow and red colours
You make us astronomers guess your age..

You come single or come with a group or you simply come in a pair
You come visible to the naked eyes or with telescopes you make us stare
You are non interactive or you make your lighter companions fly
You are either taking birth or you are ready to die..

I look towards you with all the zest and zeal
For the secrets of universe which you promise to reveal
For centuries in the sky that you have been
And for series of generations looking at you have seen

Have I really grown any bit old to know you, I still ponder
Oh dear twinkle twinkle what you are I still wonder !!!

Thursday, March 15, 2012

The Tiny Drop


This was another day when pouring were the rains
This was another day when filled were the drains

This was another day when I would love to drench wet
And not come home until the sun was set

This was another day when all were contendors of a rat race
Were driving until crazy just to find some dry place

Underneath the shade, on a nearby leaf I saw something pop
Drawing my attention amidst chaos there rested a tiny Drop

Laid Behind it ,the Sunny rays were crowning it with the shimmering glow
Far away its Fellow mates were painting the wondrous rainbow

Deep in my thoughts I recalled its other friend whom I met as a morning dew
How I envisioned the shivering flowers were flaunting their marvellous hue

Come the gushing wind and the leaf may just bend
Or the gleaming rays may just lead the drop to its end

But still in the drops miniature life span
It would have learnt to be absorbed and fill the mighty ocean.

Sunday, January 29, 2012

चर्चा

                   
     आज शामू कि टपरी पर माहौल फिर था कुछ गरम
        राजनीति कि चर्चाएं छू रहीं थी अपना चरम
 देश में कितनी भुकमरी है , कितना बढ़ गया है भ्रष्टाचार ,
       इस देश में तो गरीबों का जीवन है बड़ा लाचार
सरकार भी कितनी उदासीन है, सिर्फ ताकत का है बोलबाला
चंद सिक्कों की खनक ने मनुष्य को कितना स्वार्थी है बना डाला

      इन्हीं चर्चाओं के शोर में कसक रही थी एक आह
     पास ही कि एक झोपडी में कोई भर रहा था कराह
  चटाई पर मैली सी चादर ओढ़े एक बुढ़िया थी सिमटी
   बुखार के कारण उसकी कुछ कपकपी थी न थमती
कुछ ही दूर पर उसकी बिटिया बैठी थी झुकाए अपना सर
   अपनी माँ की हर एक आह पर उठती थी वो सहर
    तेल की कुछ बूंदों ने उसे असमंजस में था डाला
  क्या वो जलाए उसमें घर का चूल्हा या वो करे उजाला
     घड़ी की टिक टिक पर कुछ और समय था बीता
   आंसू भी सूख चुके थे उसके, आँखें हो गई थीं रीता
    कुछ देर बाद उस झोपडी की ओर मुड़ी थी एक राह
लेकिन तब तक उस झोपडी में शांत हो चली थी वह आह

         शामू की टपरी में अब भी जारी थी चर्चा
कैसे उठाएगी वो अबला उस बुढ़िया के कफ़न का खर्चा ??