कल सुबह से ही मैं खुश थी, होठों की हंसी नहीं रही थी थम,
महीनों का वादा पूरा होना था आज, आज था सिनेमा जाने का कार्यक्रम .
ढेरों काम करने हैं आज, शाम की है जोरों पे तैय्यारी
केशों की सज्जा, माथे पे बिंदी और पहनूंगी उसकी दी हुई साड़ी
सज संवर कर बैठी करूँ शाम होने का इंतज़ार
खिड़की पर बैठे मेरी नज़रें उसका रस्ता तके बार बार ...
दूर से एक परछाईं धीमी चाल में मेरी ओर बढ़ी
मेरा मन मचला- चलो आ ही गयी वो खुशनुमा घड़ी
कुछ बोझिल सा मन और आँखों में दिखी एक अधूरी आस
शायद दफ्तर कि थकान या बॉस कि फटकार ने किया था मन को उदास
उसने 'टाई' एक ओर फेकी और अपना झोला एक ओर फेका
पर अफ़सोस इस पूरे कार्यक्रम में उसने मेरी ओर एक बार भी नहीं देखा
मैं भीतर जा पानी का गिलास ले आई
गिलास थामते ही उसने नज़र मेरी ओर घुमाई
उसकी आँखों में कुछ और कसक सी उठी जाग
मेरे चेहरे से नज़र उस कमरे के कोने में गई भाग
न जाने कैसी कश्मकश थी उस कमरे में एक चुप्पी सी छा गयी
मुझसे किस मुह से इनकार करे, उसके मन में दुविधा सी आ गयी
बड़ी देर की चुप्पी को फिर मैंने ही खुद से तोड़ा
अपने दिमाग में चल रही कड़ियों को सलीके से जोड़ा
कहा मैंने 'इतना दूर सिनेमा देखने जाने का काम है बड़ा झंझट वाला
वैसे भी 'टीवी' पर मेरा पसंदीदा 'रिअलिटी शो' है आनेवाला
सोफे पर टिककर चाय कि चुस्की लेकर मजे से 'टीवी' देखेंगे
सिनेमा का मन नहीं हो रहा आज, उसके बारे में फिर किसी और दिन सोचेंगे '
उसके चेहरे की कुछ दूर होती दिखी थकान
तनाव के बादल कुछ हटे तो दिखी उसकी प्यारी सी मुस्कान
उसने टीवी चला दी कुछ हंसी उसके चेहरे पे थी खिली
इस सुन्दर एहसास के साथ में चाय बनाने रसोईघर में चल पड़ी ...
brings spontaneous smile on face!! :) well detailed picture of the scene and emotions created!!! almost a fairytale in present times!!! :)
ReplyDeleteI could never ever imagine such an attribute of poem in a physicist. Impressive!
ReplyDeleteBahut achchhe dhang se kahanee ke jaise ek ghatana ko kavita ka roop de diya...bahut achchha, wastav me ati prasansneey rachna !!
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