Tuesday, November 29, 2011

नेता और गाड़ी


किसी रोज़ नेताओं की टोली का बना कार्यक्रम
चार पहिये गाड़ी में सवार सब निकल पड़े करने भ्रमण
कुछ ही दूर चलने पर गाडी चर्रायी
चलते चलते जैसे हो वो गुस्साई
तभी सब नेताओं ने अपने सर खुजलाये
इस चर्राने के राज़ को जानने  के लिए अपने दिमाग के घोड़े दौडाए

उनमें से बोला एक - लगता है हम सबका वजन हो गया है भारी
इसलिए हमें उठाने में शायद दिख रही है इस गाड़ी की लाचारी
मंत्री जी मुस्काये
फिर कुछ सुनाये
हमारे वजन से इस गाड़ी को क्या होगी दिक्कत
भूसा और चारा खाकर अब कहाँ बन पाती है इतनी सेहत
वैसे भी जनता के हिसाब से अब हमारी नियत हो गई है हलकी
इसलिए हमारा भार उठाने में गाड़ी असमर्थ हो ये बात है गुज़रे कल की

बोला दूसरा - अरे मंत्रीजी मुझे तो लगता है इस गाड़ी का हो गया है कुछ पुर्जा ढीला
या तो फसा है कार्बोरेटर में कचरा या फिर हो सकता है गिरा है कोई कीला
मंत्री जी फिर मुस्काये
फिर कुछ सुनाये
अरे इंजिनियर साहब, तुम भी कहाँ जोड़ रहे हो पुर्जों का मेल
चलने के लिए गाड़ी को नहीं लगते कीले, लगता है बस तेल
तुम लोग अपने दिमाग के घोड़े सही दौड़ाओ
नहीं तो फ़ौरन इस गाड़ी से उतर जाओ

तभी मंत्री जी का बोला एक चेला
जिसने अपने दिमाग को कुछ देर था ठेला
मुझे लगता है ये गाड़ी हो गयी है पुरानी
इसलिए हो सकता है लगी है कराहनी
फिर मंत्री जी बोले - क्या बात करते हो कि गाड़ी हो गई है पुरानी
अरे कई चुनाव रैलियों में हमें ढोने की है इसके पास कहानी
अब तक तो ये गाड़ी कभी नहीं थी चर्राई
फिर इतने सालों में आज ही क्यूँ गुस्साई

फिर कहा सुनो ये गाड़ी है अंत में केवल चार पहियों का खेल
जब तक बना रहे इनमें आपसी मेल
और पड़ा रहे इनमें वादों का ढेर सारा तेल
तब तक चलती रहेगी ,चलती रहेगी , बिना रुके
न चूँ करेगी, न आह भरेगी, दौड़ेगी बिना थके
ये चार पहियों में से पहला पहिया है सरकारी अफसर
बिन हमारे हुकुम बजाये ये पहिया तो करेगा भी नहीं चर
दूसरा वाला है आम आदमी जो हमारी योजनाओं से है चलते
हमारे ही आशीर्वादों से हैं इनके घर परिवार पलते
तीसरा पहिया वो इंसान हैं जो गरीबी रेखा के ठीक नीचे बसता है
गाड़ी चले न चले रास्ते के कंकड़ पत्थर से यही अपनी तली घिसता है
चौथा पहिया समाज का व्हाइट कौलर हिस्सा है
तीन पहियों के साथ मूक सम्मति में सम्मिलित होना ही इसका किस्सा है
हमारी वोटों की बैंक इस पहिये से नहीं है भरी जाती
पर इसकी उदासीनता भी इस गाड़ी को आगे है ले जाती

अब जो ये घर्षण से गाड़ी है चरमराई
  लगता है देनी पड़ेगी तेल मालिश की दवाई
चुनाव आ रहा है वक़्त ले रहा है तेजी से करवट
इस गाड़ी में करनी पड़ेगी ' टू टी ' भ्रष्टाचार की मिलावट
अरे ड्राईवर से कहो ये गाड़ी अभी बहुत चलेगी थोड़ा और तेजी से चलाये
कहीं अन्ना की गैरेज इस पर लोकपाल का ताला न लगवाए...




Wednesday, September 28, 2011

उड़ान


                    
मद्धिम सा प्रकाश प्रज्ज्वलित कर रहा था एक राह
खिसकाई चटखनी तो दरवाजे ने ली एक ज़ोरदार कराह
कमरे का हर कोना एक सा प्रतीत होता था एक ही परत की वहां जमी थी धूल
ज़मीन पर बिखरे थे  मुरझाये हुए कुछ गुलाब के फूल
उसकी लाइ हुई सुनहरी घड़ी का कुछ लग रहा था पुर्जा ढीला
काढ़ी हुई सफ़ेद चादर का रंग कुछ लग रहा था पीला
कोने पर फूटी पड़ी थी चूडियाँ और फर्श पर बिखरा था काजल
आँखों के सामने से गुजरने लगा मेरा बीता  हुआ कल........

कुछ ही समय पहले तो शादी को समझने का मैंने किया था प्रयास
आई थी इस घर में गहनों से सजी, ओढ़े लाल लिबास
मेरे भी अनगिनत सपने थे, थे मेरे अनगिनत अरमान
चाहत थी ये पंख फैलाकर मैं भी भरूं ऊँची उड़ान

कुछ रोज पहले की ही तो बात है एक तिनका भी नहीं हिलता था मेरे बिना
अब तो चाहे दो जून की रोटी को तरस जाओ, बदले में मिलती है बस कुंठा और घृणा
कुछ रोज़ पहले की ही तो बात है सुबह भी मेरे भजन की गूंज से ही थी खनकती
मेरे माथे की बिंदी उस सूरज के प्रकाश से ज्यादा थी दमकती
अब तो मेरा मंदिर में जाना भी है निषेध,
भगवान भी इंसान हो गया है शायद...करने लगा है भेद!!
इससे पहले जब कोई मेरा हठ न हो पाता था पूरा
अपनी बात मनवाने के लिए मैं तो बहा देती थी आंसुओं की धारा
अब तो मेरा हर सपना मेरी आँखों के अन्धकार में ही है ढलता
मेरे इन आंसुओं से किसी एक का भी दिल नहीं है पिघलता ?
क्यूँ नहीं कूदने दिया मुझे उस आग में , मैं कम से कम सती तो कहलाती
ये श्वेत रंग की शांति मेरे नसीब तो न लिखी जाती

इस धुंधलके से बाहर झाँका तो लगा वक़्त बहुत तेजी से है गुज़र गया
मेरी खुशियों का खजाना किसी पिंजरे में कैद होकर ही रह गया
तोडूंगी ये पिंजरा मैं लूंगी उस पंछी से उसके पर मांग
दूर खड़ी उस चोटी से मैं भी लगाउंगी ऊँची छलांग
फिर होगी मेरे पैरों तले ज़मीन सर पे खुला आसमान
तोड़ दूंगी सारे बंधन मैं भी भरुंगी ऊँची उड़ान
कमरे का सन्नाटा बरकरार था पर मैंने ढूंढ़ ली थी अपनी राह
चटखनी लगाने से पहले फिर से आई एक ज़ोरदार कराह |

Friday, July 1, 2011

श्रद्धा

क्या मौसम था तरोताजा; बेरोकटोक हवा चल रही थी 
घडी के कांटे  आठ बजा रहे थे पर अफ़सोस मेरी आँख नहीं  खुल रही थी..
लम्बे अरसे बाद मिला था ये सन्डे एकदम खाली 
बिस्तर छोड़ने की शर्त थी चाय की गरमागरम प्याली 

किन्तु परन्तु बंधू मेरे सपनों के महल में किसी ने घुसखोरी मचाई 
'तुरंत नहा धोकर तैयार हो जाओ' रसोई घर से तीखी घोषणा चली आई..
माँ की आज्ञा हो या हो विपक्ष का वार
ये दो हथियार कभी जाते नहीं बेकार...
'नहा धोकर तैयार हो गए हैं हम' जब हमने पहुंचा दिया सन्देश..
'मंदिर चलना है कुछ ही देर में ' हाई कमांड से आया आदेश 
अरे बिना अप्पोइन्त्मेन्त ये कृष्ण मुरारी ने हमारी पिक्चर का प्रोग्राम चौपट कर डाला
माँ के साथ संभाषण एकतरफा था, ये जान पहनी चप्पल और टंगा झोला .. 

मंदिर के बाहर जब चप्पल उतार के आँखों के समक्ष इतनी भीड़ नज़र आई
तब ये अप्पोइन्त्मेन्त का फायदा किसे ज्यादा होता ये बात बिजली की तरह दिमाग में कौन्धाई..
लेकिन इतनी सारी भीड़ देखकर मन में कुछ ख़ुशी रही थी जाग
हम अकेले महान नहीं थे' औरों ने भी किया था अपनी निद्रा का परित्याग!
हाथ में पूजा की थाली और सर पे दुपट्टा ओढ़ 
न जाने कितने श्रद्धालु खड़े थे अपने हाथों को जोड़..
अरे भीड़ से निकलकर माँ सीधे मेरी ओर चली आईं
आँख बंद कर प्रार्थना करो' ये कहकर थोड़ी सी डांट उन्होंने मुझे पिलाई 
हाथ जोड़कर हम भी उन श्रद्धालुओं की गिनती में हो गए शामिल 
आँखें मीचते ही सामने का दृश्य हो चला धूमिल...
 आँखें बंद कर घंटों खड़े होना, ऐसे मैं कैसे लगता मेरा मन
क्या आपके मुरारी जी प्रसन्न होंगे देखकर मेरे ये क्षण भर के जतन!
कुछ ही समय पश्चात मेरे कानों में गूंजी एक आवाज भारी भरकम
हम तो बहुत ही गलत थे हमारी इच्छाशक्ति में तो था बड़ा ही दम..

"प्रभु बोल रहे हैं हम ;कुछ चाहत हो तुम्हारी तो हमारे समक्ष रखो अपनी मांग
ऐसी दैविक ध्वनि सुनकर रह गए थे हतप्रभ ; सोचने लगे इतनी जल्दी क्या ले मांग...
फिलहाल के लिए तो मुझे बस दे दो एक छोटा सा वरदान
मंदिर के अहाते के श्रद्धालुओं के मन में है क्या - बस लेना है वही जान..
'तथास्तु ' कह वो आवाज हो गई उसी मूर्ति में विलोप 
तभी श्रध्हलुओं के तगादों का मेरे कानों पे  पड़ा प्रकोप..
कहीं अपने पास होने के लिए मुरारी जी से हो रही थी गुजारिश
तो कहीं कोई नौकरी मिलने के लिए कर रहा था मुरारी जी से सिफारिश
जहाँ नौकरी थी वहां तनख्वाह में बढ़ोतरी की थी गुहार
कहीं बढती हुई महंगाई को लेकर कोई लगा रहा था मुरारी जी को ही फटकार 
कहीं शादी की थी चिंता, तो कहीं शिकायत थी भुकमरी
कहीं कारण था घर के कलह झंझट, तो कहीं परेशानी थी बीमारी 

इन्ही कर्कश आवाजो में मेरे कानों में पड़ा कोई कोमल सा स्वर
इक नन्ही सी गुडिया की आवाज लग रही थी उस सारे शोर में मधुर 
उसे कल रात का भोजन हुआ था नसीब इस बात के लिए थी वो शुक्रगुज़ार
उसकी बीमार माँ आज भी जिंदा है इस बात के लिए वो करती नमन बार बार
घर से स्कूल तक सभी प्रियजनों के लिए कर रही थी वो प्रार्थना 
सभी के स्वास्थ और खुशियों की थी उसमें मंगल कामना..
कक्षा में प्रथम आने का मुरारी जी को धन्यवाद वो दे रही थी अपार
उसकी प्रार्थना के हर शब्द में व्यक्त होता केवल आभार..

सभी आवाजों के बीच भी गया था ये कोमल स्वर मेरे मन को भेद
मंदिर आने का मेरे मन में नहीं रह गया था कोई खेद..
हम सबके पास शिकायत करने के लिए कभी भी वक़्त की होती नहीं कमी
लेकिन उस '(अ) बोध बालिका 'की प्रार्थना सुन मेरे आँखों में आ गई कुछ नमी
मुरारी जी के साथ का उसका संभाषण कुछ और सुनने में मिलता इतने में माँ की कोहनी मुझसे टकराई
 वापिस घर नहीं चलना ये कहते हुए वो जरा सा मुस्कुराई 

आँखें खोली तो मंदिर में अब भी भीड़ थी और बरकरार था लोगों का कोलाहल
मूर्ति की तरफ झट से नज़र घुमाई तो देखा मुरारी जी खड़े थे मुस्कुराते हुए बिलकुल अचल!

 
     
    
 

Saturday, April 16, 2011

अनोखी भीख

एक दिन हमारे नटवर जी का घर पे लग नहीं रहा था कुछ मन
बाज़ार की ओर चल दिए वो झोला उठाये, बन - ठन
कपडे, खिलौने, बर्तन बिकते; तो कहीं बन रहे थे ताज़े पकवान
नटवर जी हमारे शौक़ीन; मुड़े चले जहाँ थी एक चाय की दुकान

जैसे ही आगे बढे नटवर जी को एक आवाज दी सुनाई
पीछे मुड के देखा तो एक दुबली सी काया उन्हें नजर आई
"ओ बाबूजी अगर इस मतलबी दुनिया में भी है अगर आप के दिल में कोई रहम
तो इस गरीब, लाचार, बेसहारे को चाय पिलवादो न  गरमागरम...."
उसकी इस अनोखी  मांग से नटवर जी हमारे कुछ चकित से रह गए
उस भिखारी के चेहरे को निहारते वे सहसा ही उसकी ओर खिंचे चले गए.

नटवर जी मुस्काते हुए बोले "महाशय यदि आपने हमारे कुछ प्रश्नों का उत्तर दे डाला
तो हम भी आपको ख़ुशी ख़ुशी पिलवा देंगे चाय का एक गरमागरम प्याला."
बोले फिर नटवर जी "हाथ पाँव तो सलामत है भाई, फिर क्यूँ रखते हो तुम भीख पाने की ख्वाइश?
लोगों को दो जून की रोटी नसीब नहीं होती और तुम करते हो चाय की फरमाइश......!
कर क्यूँ नहीं लेते कोई नौकरी, योजनायें तो कई बनाती है हमारी सरकार
क्यूँ इस तरह दर दर की ठोकर खाकर कर रहे हो अपना जीवन यूहीं बेकार ."

भिखारी बोला "बाबूजी क्या ज़रुरत है मुझे, क्यूँ करूँ आखिरकार मैं नौकरी?
सुबह नौ से शाम छः तक मालिक की फटकार खाकर करता रहूँ उसकी दिन रात चाकरी?
मैं मुक्त हूँ , आजाद हूँ ,जैसे चाहूँ  वैसे चुनता हूँ अपनी खुद राह
कोई मुझसे सफाई मांगे इस बात की भी नहीं रहती मुझे कोई परवाह...

मगर सोचो अगर कर रहा होता मैं नौकरी तो मुझपर भी न जाने कितने लोगों की उम्मीद टिकी होती..
बच्चे करते खिलोनों की फरमाइश तो बीवी बैंक बैलेंस संवारने की गुहार लगा रही होती...
इन सब विपदाओं से दूर हूँ इसलिए बड़ा सुखी लगता है मुझे अपना जीवन..
नहीं है किसी को मुझसे कोई आशा नहीं है मुझपर जिम्मेदारियों का बंधन
और अभी जो अपने मेरी फरमाइश पर मुझपर प्रश्नों की जो बौछार है कर डाली
तो आज सुबह बोहनी तगड़ी हुई थी बाबूजी, चाय की व्यवस्था तो मैंने दिन में ही थी कर डाली..
चाय की तलब तो दिल में बड़ी देर से रही थी जाग
आपको देखा तो सोचा आपके समक्ष रख दू मैं अपनी मांग.."

नटवर जी भौंचक्के से खड़े रहे उसकी ये सारी बातें सुन
कुछ देर मौन के पश्चात बोले "अच्छा बोलते हो भाई , भावी नेता बनने का तुम में हैं बहुत गुण."
"अरे बाबूजी नेता और मुझमे कुछ ज्यादा फरक नहीं रह जाता
मैं नोटों की भीख मांगता हूँ तो वो वोटों के लिए गुहार है लगाता..
और फिर अगर बात इमानदारी की आये तो मुझसे ज्यादा गया गुजरा है वो आपका चुना हुआ नेता
मैं तो आपसे हाथ जोड़कर पैसे मांगता हूँ , वो तो बिन बताये ही आपकी जेब खाली है कर देता.
वो तो केवल वोट मानते वक़्त ही करता है आपको नमस्कार
मैं तो पैसे मिलने के बाद भी आजीवन दुआएं देता हूँ  हज़ार...
और बात अगर stability की करें तो पांच साल बाद क्या है आपके इस नेता की बिसात
इससे ज्यादा तो कर्मठ मैं हूँ मेरा काम चले है जन्म से मृत्योपरांत ..."

"छोडिये न बाबूजी आप भी तो करते हैं इन नेताओं जैसे ही वादे
एक प्याला चाय के लिए कर डाले न जाने कितने सौदे.."
नहीं पीना चाय आपकी ये कहते हुए वो दुबली काया हो गई उनके आँखों से ओझल
उसका ये जवाब सुन बाबूजी खड़े रह गए स्तब्ध और अचल..
कहाँ चले थे हमारे नटवर जी बनने महात्मा, देते उसे कुछ पैसों की भीख
वहीँ वो अनपढ़ गरीब भिखारी दे गया उन्हें जीवन की अनोखी सीख, अनोखी सीख.




 





Sunday, December 19, 2010

​ फ़र्ज़



वैसे तो वे किस्मत के बड़े धनी थे,
अखबार में मचाते हर रोज़ सनसनी थे.
कॉलेज में मन लगाकर जो सीखा था कायदा,
लगता है पूरे शहर में सबसे ज्यादा इन्हें ही हुआ था फायदा.
बड़ा सा बंगला और उसके सामने चौड़ा सा अहाता
एक से एक बढ़िया गाड़ियों का लगा रहता था ताँता
कानून के दांव पेंच में ऐसे माहिर कि जब भी देते थे दलील
सामने वाले की छुट्टी हो जाये, ऐसे मशहूर थे ये वकील.

एक दिन एक बूढा रोज़मर्रा के काम से अपने घर से क्या निकला,
किसी मनचले की गाड़ी ने बिचारे को जा कुचला. 
अब इस मनचले पर समस्या कुछ भारी थी,
अगले ही महीने तो इसपर चुनाव की ज़िम्मेदारी थी.
अब इस समस्या कि घड़ी में किसका दरवाजा खटखटाए
अरे शहर के इन नामी वकील से बेहतर क्या होगा कोई उपाय
और इनकी किताब में तो पहले से ही दर्ज था-
जिसकी बड़ी आय,
उसीको मिलेगा न्याय!!

तो फिर केस की सुनवाई जो शुरू हुई तो सरकारी वकील की भी गल न पाई दाल
वकील साहब ने ऐसे दांव पेंच खेले कि कोर्ट में आ गया भूचाल
अंत में साबित कर दिया कि ये तो था एक्सिडेंट का केस
बूढ़े को बना दिया अँधा, मिट ही गया क्लेश
केस की जीत से वकील साहब की थम नहीं रही थी मुस्कान
तभी भीड़ में से निकलकर आया एक व्यक्ति अनजान
बोला 'जीते जी तो तू उसे दे न पाया कोई सुकून
उस दिन उस गाडी के नीचे हुआ था तेरे ही बाप का खून
यूँ तो वो उसी दिन मर गया था जब तू उसे छोड़कर था आया
आज तूने सही मायने में उसे दफनाकर अपने बेटे होने का फ़र्ज़ है निभाया !!!'

Sunday, October 3, 2010

​ आभास



                      ये कैसा आभास है, ये कैसा आभास है
                    सागर से नजदीकियां हैं फिर भी क्यूँ प्यास है?
                       ये कैसा आभास है, ये कैसा आभास है

धुंधली सी नज़र है, एक छवि ओढ़े लिबास है
मुड़ती सी सड़क है, उसके लौट आने की आस है
ये कैसा आभास है, ये कैसा आभास है

                     उस चकोर को हरदम अपने चाँद की तलाश है
                    उस मयूर को भी तो बस मेघा के बूंदों की प्यास है
                           फिर मुझे ही क्यूँ अकेला रहना रास है?
                           ये कैसा आभास है, ये कैसा आभास है

गुज़रा वक़्त नहीं लौटता इसका विश्वास है
भूलने की चाहत है पर यादें कुछ ख़ास हैं
बहती हवा में मुझे उसकी महक का एहसास है
ये कैसा आभास है , ये कैसा आभास है.

Thursday, September 23, 2010

फितरत

                           किनारे पे खड़े उस मुसाफिर को अब किसी कश्ती की क्या जरूरत?
                            उस बहादुर जाबाज़ को किसी तिनके के सहारे की क्या जरूरत?
                             जिसके पास हो पूरा आफताब उसे किसी शमा की क्या जरूरत?
                          आप चुनते हैं मंजिल जो अपनी उन्हें रास्ते दिखाने  की क्या जरूरत?
                      उस महकते  हुए खुशनुमा चमन को किसी पतझड़ से डरने की क्या जरूरत?
                      जिसके पास हो हज़ारों का प्यार उसे किसी मामूली  दुआ की क्या ज़रुरत?

                                    वक़्त तो बदलता ही रहता है ये तो है वक़्त की जरूरत
                          फिर क्यूँ आते हैं सवालिया निशाँ जब भी आता है ये अलफ़ाज़ जरूरत.


                             बदलते वक़्त में उस मुसाफिर को कभी तो उस पार जाना होगा,
                                    तब उसे अपने लिए उस कश्ती को ही बुलाना होगा.


                                  बदलते वक़्त में जाबाज़ भी तुफानो में घिर सकता है,
                       तभी कोई तिनका उसके डूबते वक़्त में उसका सहारा बन सकता है.


                                      बदलते वक़्त में ये शमा ही तुम्हारे करीब होगी
                                   ढलती शाम में तुम्हारे रोशन जहाँ का नसीब होगी.


                        बदलते वक़्त में क्या पता कोई नशा तुम्हारी मंजिल धुंधली कर जाये
                                  तब किसी की ऊँगली ही तुम्हें सही रास्ते पे ले आये.


                                    बदलते वक़्त में नए फूलों को भी तो खिलना होगा,
                                  इसलिए पतझड़ के मौसम को चमन में आना ही होगा.


                              वक़्त बदले न बदले क्या तुमने जाना है क्या है वो मामूली दुआ,
                                    तुम ही सोचो तुम्हें हज़ारों का प्यार कैसे नसीब हुआ.


                                         न देना कोई नारा न ही देनी कोई नसीहत
                                  हर कोई तलबगार है यहाँ हर किसी की है कुछ जरूरत
                                  इसलिए ऊपरवाले से करनी है बस इतनी सी इबादत
                                         बदले चाहे वक़्त पर न बदले इंसानी फितरत.

Monday, August 16, 2010

​ अंतर


बारिशें तब भी होती थीं , बारिशें अब भी होती हैं
पर इनमे दिखता है बस थोड़ा सा अंतर
तब भीगता था धरती का हर कोना
अब बस मेरी पलकें हो जाती हैं तर

                    रातें तब भी सूरज के ढलने से होती थीं, रातें होतीं है जैसे अब
                    पर इनमे दिखता है बस थोडा सा अंतर
                    तब पलक झपकाते ही सुबह होती थी
                   अब ये कुछ लम्बी हो गयीं है, पाती नहीं गुज़र

होली तब भी तो खेलते थे, होली अब भी खेलते हैं
पर इनमे दिखता है बस थोडा सा अंतर
तब हर रंग का बराबर योगदान होता था सजाने में
अब तो बस लाल का ही दिखता है असर

                   दिवाली तब भी होती थी और दिवाली अब भी होती है
                   पर इनमे दिखता है बस थोडा सा अंतर
                   तब हर घर में पटाखे- बम जलते थे
                  अब इन बमों से जलते हैं घर !!

Monday, May 10, 2010

ताजमहल

गूंजती हर धड़कन, मन छेड़े है कोई साज़
आँखों में उतरती ये तस्वीर ये है 'भारत का ताज'
दशकों से खड़ी आगरा में सुंदरता की ये बेमिसाल निशानी
इसके पीछे छिपी है दो प्रेमियों की ऐतिहासिक कहानी...

सोने की चिड़िया था जो देश, एक बादशाह की हुकूमत थी वहां
बेगम थी उसकी मुमताज और बादशाह का नाम था शाहजहाँ
चौदहवीं संतान के जन्म में मुमताज ने अपनी जान थी गवाईं
पर चाहकर भी अपनी प्रिय बेगम की याद बादशाह को न बिसराई
अपनी चहेती बेगम की बादशाह को बनवानी थी मज़ार
ऐसी मज़ार जो पूरी दुनिया में रहे यादगार..

इस मज़ार के हर पत्थर को तराशा जाये ऐसी थी शहंशाह की थी ख्वाइश
कुछ बीस हज़ार कारीगरों ने इसे बनाने में लगाये साल बाईस
देश विदेश से कीमती रत्नों के मंगाए अट्ठाईस प्रकार
चार मीनारों के कन्धों में सजी अमरुद गुम्बज ने बढाया ताजमहल का निखार
इस मज़ार को बनाने में लगा बीस हज़ार हाथियों का साथ
और बादशाह ने उस जमाने में लगाई साढ़े तीन करोड़ की लागात
सन १६४३ में हुआ पूरा इस मज़ार का निर्माण
ताजमहल के नाम से आठ अजूबों में एक करे ये भारत की ऊंची शान .