Monday, August 16, 2010

​ अंतर


बारिशें तब भी होती थीं , बारिशें अब भी होती हैं
पर इनमे दिखता है बस थोड़ा सा अंतर
तब भीगता था धरती का हर कोना
अब बस मेरी पलकें हो जाती हैं तर

                    रातें तब भी सूरज के ढलने से होती थीं, रातें होतीं है जैसे अब
                    पर इनमे दिखता है बस थोडा सा अंतर
                    तब पलक झपकाते ही सुबह होती थी
                   अब ये कुछ लम्बी हो गयीं है, पाती नहीं गुज़र

होली तब भी तो खेलते थे, होली अब भी खेलते हैं
पर इनमे दिखता है बस थोडा सा अंतर
तब हर रंग का बराबर योगदान होता था सजाने में
अब तो बस लाल का ही दिखता है असर

                   दिवाली तब भी होती थी और दिवाली अब भी होती है
                   पर इनमे दिखता है बस थोडा सा अंतर
                   तब हर घर में पटाखे- बम जलते थे
                  अब इन बमों से जलते हैं घर !!

Monday, May 10, 2010

ताजमहल

गूंजती हर धड़कन, मन छेड़े है कोई साज़
आँखों में उतरती ये तस्वीर ये है 'भारत का ताज'
दशकों से खड़ी आगरा में सुंदरता की ये बेमिसाल निशानी
इसके पीछे छिपी है दो प्रेमियों की ऐतिहासिक कहानी...

सोने की चिड़िया था जो देश, एक बादशाह की हुकूमत थी वहां
बेगम थी उसकी मुमताज और बादशाह का नाम था शाहजहाँ
चौदहवीं संतान के जन्म में मुमताज ने अपनी जान थी गवाईं
पर चाहकर भी अपनी प्रिय बेगम की याद बादशाह को न बिसराई
अपनी चहेती बेगम की बादशाह को बनवानी थी मज़ार
ऐसी मज़ार जो पूरी दुनिया में रहे यादगार..

इस मज़ार के हर पत्थर को तराशा जाये ऐसी थी शहंशाह की थी ख्वाइश
कुछ बीस हज़ार कारीगरों ने इसे बनाने में लगाये साल बाईस
देश विदेश से कीमती रत्नों के मंगाए अट्ठाईस प्रकार
चार मीनारों के कन्धों में सजी अमरुद गुम्बज ने बढाया ताजमहल का निखार
इस मज़ार को बनाने में लगा बीस हज़ार हाथियों का साथ
और बादशाह ने उस जमाने में लगाई साढ़े तीन करोड़ की लागात
सन १६४३ में हुआ पूरा इस मज़ार का निर्माण
ताजमहल के नाम से आठ अजूबों में एक करे ये भारत की ऊंची शान .