Friday, October 9, 2020

शिकायत

मैं दिन भर चुपचाप मुस्कुराती हूँ 
बस रात में तकिये के कोने भिगोती हूँ 
इस बात की उन्हें मुझसे शिकायत है 

मैं उनकी महफ़िलों में खुलकर शामिल नहीं होती 
उनकी मस्खरियों पर अब खुल के ठहाका नहीं लगाती 
इस बात की उन्हें मुझसे शिकायत है 

रोटियां गिन कर बनती हैं घर में , 'बस केवल एक ?'
इस बात की उन्हें मुझसे शिकायत है

एक अरसा था जब मेरे घर देरी से आना 
इस बात की उन्हें मुझसे शिकायत थी 
आज मैं अपने कमरे में पूरा दिन बंद क्यूँ हूँ 
इस बात की उन्हें मुझसे शिकायत है

काम के लिए मेरा उतावलापन रोके न रुकता था 
आज मैं दफ्तर क्यूँ नहीं जाना चाहती 
इस बात की उन्हें मुझसे शिकायत है

दुनिया में हो रहे हर सही-गलत के लिए लड़ना मिज़ाज था मेरा 
आज हालातों से क्यूँ नहीं लड़ती 
इस बात की उन्हें मुझसे शिकायत है

कई मरतबा मेरे अल्फ़ाज़ों ने बहुत कुछ बयाँ  किया है 
आज क्या नया ढूंढ रहे हो नज़म में प्रिए  
मेरी खामोशियाँ क्यूँ सुनाई नहीं देती 
इस बात की मुझे उन सब से शिकायत है।