Friday, November 14, 2014

बचपन

         

वह अनमना सा बुझा बुझा चला जा रहा था
और माथे से पसीने की कुछ बूँदें टपका रहा था
क्या सचमुच गोदाम में पड़ी वो बोरियां थीं इतनी भारी 
या इससे भी बोझिल उसके नन्हे कन्धों पे थी कोई ज़िम्मेदारी
सूखे से होंठ हो चुके थेऔर आँखों के नीचे गड्ढे थे काले 
कटी थी उसकी एड़ियां और उसके नाज़ुक हाथों पे पड़े थे छाले
बस अपनी परछाईं से दूर भागने के प्रयास में 
और फिर अचानक से बस एक बार वो पाठशाला की घंटी सुनने की आस में
वो दौड़ रहा था अपनी ही धुन में होकर मगन 
शायद उसी ओर जहाँ पर वो छोड़ आया था अपना प्यारा सा बचपन 
हाँ वही बचपन जब वक़्त हमारे लिए होता था बड़ा सस्ता 
हमसे भी भारी होता था हमारे कंधे का बस्ता 
एक पेंसिल के खोने पे जो दिन भर ही थी मैं रोती
बड़ी से बड़ी गलती की सजा एक सॉरी से पूरी होती 
फिर अगर दीदी से आईस क्रीम के लिए हो जाये लड़ाई
तुरंत मनगढ़ंत शिकायत कर माँ से उसकी करवा देती थी पिटाई 
खेलने की जुंग में जब होम वर्क भी रह जाता था अधूरा 
दस बजने के बाद तो पापा सीरियल भी न देखने देते थे पूरा 
सारी मेहनत कर भी जब कक्षा में आ न पाता क्रमांक पहला 
टीचर के सामने रो-रोकर लेती थी मैं खुद को आंसुओं से नहला 
लेकिन जितने सीधे आंसू थेथी उतनी ही सच्ची मुस्कान 
बाहर की छल कपट की दुनिया से थी बिलकुल अनजान 

तो फिर क्यूँ मेरी और उस बालक कि मुस्कान में हो चला इतना फरक 
क्यूँ वह अपनी चाह की राह से हो चला इतना पृथक 
वह भी कलम थामे तो कल को डॉक्टर या इंजिनियर नहीं सकता है क्या बन 
अपने परिवार और देश की उन्नति के लिए क्या कर नहीं सकता जतन
क्या हममें से सभी, हैं नहीं इतने काबिल 
कि कर लें उस बालक को अपने पढ़े-लिखे दल में शामिल
मिलकर करें हम ये फैसला कि न हो कोई बचपन मजबूर
ऊपर उठे शिक्षित भारतन रहे कोई बाल मजदूर, न रहे कोई बाल मजदूर....

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