Thursday, October 16, 2014

हक़

कई ट्रेनें वहां से आई और गुज़र गई 
और उनके साथ आये और गए कई मुसाफिर 
वो लेकिन प्लेटफार्म की उसी बेंच पर बैठी थी 
उतनी ही मौन और उतनी ही स्थिर
और बोलती भी किससे कोई था भी तो नहीं उसके साथ 
पर उसे अबतक आदत पड़ ही गई थी खुद से करने की बात 

' गुड्डू को देखते ही उसे खूब सारी डाँट पिलाऊंगी 
खैर छोडो फिर उसे अपने हाथ के बने लड्डू कैसे खिलाऊँगी '
यही सोच उसने अपने हाथ में पकड़ी पोटली को सीने से भींचा 
और अपने एकमेव बेटे की छवि मन में आते ही पलकोँ को अनायास ही सींचा 

' वखत कहाँ मिलता होगा उसे, आज छुट्टी का दिन भी नहीं यूँ हड़बड़ाके आने के लिए 
इतनी तकलीफ करता ही न, पता दे देता, ज़रूरत भी न पड़ती लिबाने के लिए 
पता दे भी देता तो मैं कैसे बाँच  पाती 
पर बम्बई बड़ा सहर है, किसी को तो दिखा पाती '

दिन की चढ़ी धूप शाम के साथ गुलाबी हो गई 
और उसकी बुझती आस झुकती आँखो के साथ राज़ी हो गई 
' मुझे उठकर देखना चाहिए शायद बचपन में भी गुड्डू मेले की भीड़ में खो जाता था ...
या हो सकता है, अभी आता ही हो जैसे बचपन में छिपकर डरा जाता था '

लेकिन वो उठी नहीं ...प्लेटफार्म की उसी बेंच पर बैठी रही
बस वैसे ही जैसे बरगद का पेड़ सालो साल अपने जड़ो में सिमटी ज़मीं को जकड़े हो रख 
और करती भी क्या चौबीस घंटे में यही तो वो जगह थी जिसपर वो जमा सकती थी अपना हक़     

2 comments:

  1. one can visualise the scene and feel the feelings!! :)

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  2. Itna alag likhne ka andaz ki us jagah ki bhasha, uska pyar apne bete ke lie,etc..sab kuch puri tarah se aankhon ke saamne aa jae..!! great writing..

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