Wednesday, May 30, 2012

चंद्रग्रहण

    

                        
                                  एक रोज़ आकाश के सारे सितारे हो गए दंग
                                 सूरज और चाँद में छिड़ गयी कुछ अजब सी जंग
                               कौन ज्यादा अनोखा है और किसके निराले हैं अंदाज
                                     वही पहनेगा आज खूबसूरती का ये ताज
                      पृथ्वी माता पहुंची दोनों को लड़ने से रोक, बढ़ाने उनका हौसला
                    तो फसी ऐसी मध्यस्त कि निर्णायक बनकर करना पड़ा इन्हीको फैसला
                                    पृथ्वी के सामने ये समस्या थी बड़ी जटिल
                               दोनों पक्षों ने पेश करना शुरू की अपनी अपनी दलील

दिन की शुरुवात मुझसे ही होती है, हूँ में ऊर्जा देने में दक्ष
मेरे बिन न जीवन होगा, कह सूरज ने रखा अपना पक्ष

                                             न होता मैं तो निद्रा देवी कैसे आँखों में बसती
                                              बिन चाँद के आगमन से कैसे सूरज की आग पिघलती

बोला सूरज न होता मैं तो ये पौधे युहीं भूखे मर जाते
बिन मेरे तो ये बादल भी पानी नहीं बरसाते

                                            हो तुम क्रोध के प्रतीक, तुम ही पृथ्वी के जीवों को हो झुलसाते
                                          न होता मैं चाँद इतना सुन्दर तो मुझपर इतने गीत न लिखे जाते

                     ये सुन जब सूरज आग बबूला हुआ और न पाया अपना गुस्सा संभाल
                       तभी पृथ्वी बनकर आ गई चाँद सूरज के बीच में बनकर एक ढाल
                         इसी तरह सूरज के क्रोध से पृथ्वी ने चाँद को बार बार है बचाया
                            आकाश के इसी नज़ारे को हमलोगों ने 'चंद्रग्रहण' है कहलाया


Tuesday, May 15, 2012

एहसास

                               

कल सुबह से ही मैं खुश थी, होठों की हंसी नहीं रही थी थम,
महीनों का वादा पूरा होना था आज, आज था सिनेमा जाने का कार्यक्रम .
ढेरों काम करने हैं आज, शाम की है जोरों पे तैय्यारी
केशों की सज्जा, माथे पे बिंदी और पहनूंगी उसकी दी हुई साड़ी
सज संवर कर बैठी करूँ शाम होने का इंतज़ार
खिड़की पर बैठे मेरी नज़रें उसका रस्ता तके बार बार ...

दूर से एक परछाईं धीमी चाल में मेरी ओर बढ़ी
मेरा मन मचला- चलो आ ही गयी वो खुशनुमा घड़ी
कुछ बोझिल सा मन और आँखों में दिखी एक अधूरी आस
शायद दफ्तर कि थकान या बॉस कि फटकार ने किया था मन को उदास
उसने 'टाई' एक ओर फेकी और अपना झोला एक ओर फेका
पर अफ़सोस इस पूरे कार्यक्रम में उसने मेरी ओर एक बार भी नहीं देखा
मैं भीतर जा पानी का गिलास ले आई
गिलास थामते ही उसने नज़र मेरी ओर घुमाई
उसकी आँखों में कुछ और कसक सी उठी जाग 
मेरे चेहरे से नज़र उस कमरे के कोने में गई भाग 

न जाने कैसी कश्मकश थी उस कमरे में एक चुप्पी सी छा गयी
मुझसे किस मुह से इनकार करे, उसके मन में दुविधा सी आ गयी
बड़ी देर की चुप्पी को फिर मैंने ही खुद से तोड़ा
अपने दिमाग में चल रही कड़ियों को सलीके से जोड़ा
कहा मैंने 'इतना दूर सिनेमा देखने जाने का काम है बड़ा झंझट वाला
वैसे भी 'टीवी' पर मेरा पसंदीदा 'रिअलिटी शो' है आनेवाला
सोफे पर टिककर चाय कि चुस्की लेकर मजे से 'टीवी' देखेंगे
सिनेमा का मन नहीं हो रहा आज, उसके बारे में फिर किसी और दिन सोचेंगे '
उसके चेहरे की कुछ दूर होती दिखी थकान
तनाव के बादल कुछ हटे तो दिखी उसकी प्यारी सी मुस्कान
उसने टीवी चला दी कुछ हंसी उसके चेहरे पे थी खिली
इस सुन्दर एहसास के साथ में चाय बनाने रसोईघर में चल पड़ी ...

Saturday, May 12, 2012

Passing Cloud

Across the sky I see a passing cloud
For the bright light looking towards me creating a shroud..
It gets heavier as it doesn't rain
Efforts of the wind to shove it off go all in vain..
It gets darker with every ticking clock
The billows stare at me as if they mock..
I look up the heavens but only in despair
I just wanna have a glance of that celestial glare..
I keep pretenses to hide my fears
And feel too prudent to shed any tears...
Not yet a drop is ready to shed
Awaiting a long way yet to be tread...
Miles to go before I sleep...
And smiles to go before I weep....

Wednesday, May 9, 2012

Amidst the waves...

Stood abreast the stretched boundaries of the shore
Turbulent waves and perpetual horizons I adore...

With each surge nudging my feet
Manifesting nature's rhythmic beat

Teaching me that shallowness is full of volatility
Have to traverse more depths to achieve the eternal tranquility....

The depths engulf the celestial flamboyance
And so I contemplate the ambit of my pursuance

Do I have the competence to absorb all melancholy
And still look the same, so serene and yet so lovely....