आज शामू कि टपरी पर माहौल फिर था कुछ गरम
राजनीति कि चर्चाएं छू रहीं थी अपना चरम
देश में कितनी भुकमरी है , कितना बढ़ गया है भ्रष्टाचार ,
इस देश में तो गरीबों का जीवन है बड़ा लाचार
सरकार भी कितनी उदासीन है, सिर्फ ताकत का है बोलबाला
चंद सिक्कों की खनक ने मनुष्य को कितना स्वार्थी है बना डाला
इन्हीं चर्चाओं के शोर में कसक रही थी एक आह
पास ही कि एक झोपडी में कोई भर रहा था कराह
चटाई पर मैली सी चादर ओढ़े एक बुढ़िया थी सिमटी
बुखार के कारण उसकी कुछ कपकपी थी न थमती
कुछ ही दूर पर उसकी बिटिया बैठी थी झुकाए अपना सर
अपनी माँ की हर एक आह पर उठती थी वो सहर
तेल की कुछ बूंदों ने उसे असमंजस में था डाला
क्या वो जलाए उसमें घर का चूल्हा या वो करे उजाला
घड़ी की टिक टिक पर कुछ और समय था बीता
आंसू भी सूख चुके थे उसके, आँखें हो गई थीं रीता
कुछ देर बाद उस झोपडी की ओर मुड़ी थी एक राह
लेकिन तब तक उस झोपडी में शांत हो चली थी वह आह
शामू की टपरी में अब भी जारी थी चर्चा
कैसे उठाएगी वो अबला उस बुढ़िया के कफ़न का खर्चा ??
splendid.
ReplyDeleteNice.. straight to the point.
ReplyDeleteBrilliant! Brutally forthright.
ReplyDeleteDont know wat 2 say... heart touching & thoughtful.
ReplyDeleteachchi theme hai !
ReplyDeletethanks all !! :)
ReplyDeletehard hitting!!!
ReplyDeleteऔर चर्चाओं का बाज़ार गरम है, कितनी चिताएं ठंडी होने के बाद भी..!!!
really heart touching and bitter truth of majority of people which are called uncivilized and uncultured by self certified modern civilized society.....really great compile...
ReplyDeletethanks dr prakash nd wageesh..
ReplyDeletevery nice......nice creativity....keep it up.
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