Tuesday, November 29, 2011

नेता और गाड़ी


किसी रोज़ नेताओं की टोली का बना कार्यक्रम
चार पहिये गाड़ी में सवार सब निकल पड़े करने भ्रमण
कुछ ही दूर चलने पर गाडी चर्रायी
चलते चलते जैसे हो वो गुस्साई
तभी सब नेताओं ने अपने सर खुजलाये
इस चर्राने के राज़ को जानने  के लिए अपने दिमाग के घोड़े दौडाए

उनमें से बोला एक - लगता है हम सबका वजन हो गया है भारी
इसलिए हमें उठाने में शायद दिख रही है इस गाड़ी की लाचारी
मंत्री जी मुस्काये
फिर कुछ सुनाये
हमारे वजन से इस गाड़ी को क्या होगी दिक्कत
भूसा और चारा खाकर अब कहाँ बन पाती है इतनी सेहत
वैसे भी जनता के हिसाब से अब हमारी नियत हो गई है हलकी
इसलिए हमारा भार उठाने में गाड़ी असमर्थ हो ये बात है गुज़रे कल की

बोला दूसरा - अरे मंत्रीजी मुझे तो लगता है इस गाड़ी का हो गया है कुछ पुर्जा ढीला
या तो फसा है कार्बोरेटर में कचरा या फिर हो सकता है गिरा है कोई कीला
मंत्री जी फिर मुस्काये
फिर कुछ सुनाये
अरे इंजिनियर साहब, तुम भी कहाँ जोड़ रहे हो पुर्जों का मेल
चलने के लिए गाड़ी को नहीं लगते कीले, लगता है बस तेल
तुम लोग अपने दिमाग के घोड़े सही दौड़ाओ
नहीं तो फ़ौरन इस गाड़ी से उतर जाओ

तभी मंत्री जी का बोला एक चेला
जिसने अपने दिमाग को कुछ देर था ठेला
मुझे लगता है ये गाड़ी हो गयी है पुरानी
इसलिए हो सकता है लगी है कराहनी
फिर मंत्री जी बोले - क्या बात करते हो कि गाड़ी हो गई है पुरानी
अरे कई चुनाव रैलियों में हमें ढोने की है इसके पास कहानी
अब तक तो ये गाड़ी कभी नहीं थी चर्राई
फिर इतने सालों में आज ही क्यूँ गुस्साई

फिर कहा सुनो ये गाड़ी है अंत में केवल चार पहियों का खेल
जब तक बना रहे इनमें आपसी मेल
और पड़ा रहे इनमें वादों का ढेर सारा तेल
तब तक चलती रहेगी ,चलती रहेगी , बिना रुके
न चूँ करेगी, न आह भरेगी, दौड़ेगी बिना थके
ये चार पहियों में से पहला पहिया है सरकारी अफसर
बिन हमारे हुकुम बजाये ये पहिया तो करेगा भी नहीं चर
दूसरा वाला है आम आदमी जो हमारी योजनाओं से है चलते
हमारे ही आशीर्वादों से हैं इनके घर परिवार पलते
तीसरा पहिया वो इंसान हैं जो गरीबी रेखा के ठीक नीचे बसता है
गाड़ी चले न चले रास्ते के कंकड़ पत्थर से यही अपनी तली घिसता है
चौथा पहिया समाज का व्हाइट कौलर हिस्सा है
तीन पहियों के साथ मूक सम्मति में सम्मिलित होना ही इसका किस्सा है
हमारी वोटों की बैंक इस पहिये से नहीं है भरी जाती
पर इसकी उदासीनता भी इस गाड़ी को आगे है ले जाती

अब जो ये घर्षण से गाड़ी है चरमराई
  लगता है देनी पड़ेगी तेल मालिश की दवाई
चुनाव आ रहा है वक़्त ले रहा है तेजी से करवट
इस गाड़ी में करनी पड़ेगी ' टू टी ' भ्रष्टाचार की मिलावट
अरे ड्राईवर से कहो ये गाड़ी अभी बहुत चलेगी थोड़ा और तेजी से चलाये
कहीं अन्ना की गैरेज इस पर लोकपाल का ताला न लगवाए...




12 comments:

  1. super one....

    "Priyanka Brand Poem"

    Ending was crucial indeed ...

    "अरे ड्राईवर से कहो ये गाड़ी अभी बहुत चलेगी थोड़ा और तेजी से चलाये
    कहीं अन्ना की गैरेज इस पर लोकपाल का ताला न लगवाए..."

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  2. I agree with varma. A little story and a tactfully ended.

    simply great!

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  3. Really nice..the last second para of simile of 4 wheels to 4 class is true demonstration in nice way...

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  4. thanks a lot to all...ur comments really help...nd encourage me to write more..

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  5. very nice, representing present situation....I think you should approach some newspaper or some magazine for its publication..

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  6. good one!!!
    इन सब पहियों को `retread` करने का वक़्त `overdue` हो गया है!! शायद अन्ना की गैरेज में इतना तो मुमकिन हो जाए!!

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  7. thanks Dr Prakash
    @ Shishir -ye bolna hi kaafi hai ab publication ki kya zarurat.. :)..thanks indeed

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