Saturday, April 16, 2011

अनोखी भीख

एक दिन हमारे नटवर जी का घर पे लग नहीं रहा था कुछ मन
बाज़ार की ओर चल दिए वो झोला उठाये, बन - ठन
कपडे, खिलौने, बर्तन बिकते; तो कहीं बन रहे थे ताज़े पकवान
नटवर जी हमारे शौक़ीन; मुड़े चले जहाँ थी एक चाय की दुकान

जैसे ही आगे बढे नटवर जी को एक आवाज दी सुनाई
पीछे मुड के देखा तो एक दुबली सी काया उन्हें नजर आई
"ओ बाबूजी अगर इस मतलबी दुनिया में भी है अगर आप के दिल में कोई रहम
तो इस गरीब, लाचार, बेसहारे को चाय पिलवादो न  गरमागरम...."
उसकी इस अनोखी  मांग से नटवर जी हमारे कुछ चकित से रह गए
उस भिखारी के चेहरे को निहारते वे सहसा ही उसकी ओर खिंचे चले गए.

नटवर जी मुस्काते हुए बोले "महाशय यदि आपने हमारे कुछ प्रश्नों का उत्तर दे डाला
तो हम भी आपको ख़ुशी ख़ुशी पिलवा देंगे चाय का एक गरमागरम प्याला."
बोले फिर नटवर जी "हाथ पाँव तो सलामत है भाई, फिर क्यूँ रखते हो तुम भीख पाने की ख्वाइश?
लोगों को दो जून की रोटी नसीब नहीं होती और तुम करते हो चाय की फरमाइश......!
कर क्यूँ नहीं लेते कोई नौकरी, योजनायें तो कई बनाती है हमारी सरकार
क्यूँ इस तरह दर दर की ठोकर खाकर कर रहे हो अपना जीवन यूहीं बेकार ."

भिखारी बोला "बाबूजी क्या ज़रुरत है मुझे, क्यूँ करूँ आखिरकार मैं नौकरी?
सुबह नौ से शाम छः तक मालिक की फटकार खाकर करता रहूँ उसकी दिन रात चाकरी?
मैं मुक्त हूँ , आजाद हूँ ,जैसे चाहूँ  वैसे चुनता हूँ अपनी खुद राह
कोई मुझसे सफाई मांगे इस बात की भी नहीं रहती मुझे कोई परवाह...

मगर सोचो अगर कर रहा होता मैं नौकरी तो मुझपर भी न जाने कितने लोगों की उम्मीद टिकी होती..
बच्चे करते खिलोनों की फरमाइश तो बीवी बैंक बैलेंस संवारने की गुहार लगा रही होती...
इन सब विपदाओं से दूर हूँ इसलिए बड़ा सुखी लगता है मुझे अपना जीवन..
नहीं है किसी को मुझसे कोई आशा नहीं है मुझपर जिम्मेदारियों का बंधन
और अभी जो अपने मेरी फरमाइश पर मुझपर प्रश्नों की जो बौछार है कर डाली
तो आज सुबह बोहनी तगड़ी हुई थी बाबूजी, चाय की व्यवस्था तो मैंने दिन में ही थी कर डाली..
चाय की तलब तो दिल में बड़ी देर से रही थी जाग
आपको देखा तो सोचा आपके समक्ष रख दू मैं अपनी मांग.."

नटवर जी भौंचक्के से खड़े रहे उसकी ये सारी बातें सुन
कुछ देर मौन के पश्चात बोले "अच्छा बोलते हो भाई , भावी नेता बनने का तुम में हैं बहुत गुण."
"अरे बाबूजी नेता और मुझमे कुछ ज्यादा फरक नहीं रह जाता
मैं नोटों की भीख मांगता हूँ तो वो वोटों के लिए गुहार है लगाता..
और फिर अगर बात इमानदारी की आये तो मुझसे ज्यादा गया गुजरा है वो आपका चुना हुआ नेता
मैं तो आपसे हाथ जोड़कर पैसे मांगता हूँ , वो तो बिन बताये ही आपकी जेब खाली है कर देता.
वो तो केवल वोट मानते वक़्त ही करता है आपको नमस्कार
मैं तो पैसे मिलने के बाद भी आजीवन दुआएं देता हूँ  हज़ार...
और बात अगर stability की करें तो पांच साल बाद क्या है आपके इस नेता की बिसात
इससे ज्यादा तो कर्मठ मैं हूँ मेरा काम चले है जन्म से मृत्योपरांत ..."

"छोडिये न बाबूजी आप भी तो करते हैं इन नेताओं जैसे ही वादे
एक प्याला चाय के लिए कर डाले न जाने कितने सौदे.."
नहीं पीना चाय आपकी ये कहते हुए वो दुबली काया हो गई उनके आँखों से ओझल
उसका ये जवाब सुन बाबूजी खड़े रह गए स्तब्ध और अचल..
कहाँ चले थे हमारे नटवर जी बनने महात्मा, देते उसे कुछ पैसों की भीख
वहीँ वो अनपढ़ गरीब भिखारी दे गया उन्हें जीवन की अनोखी सीख, अनोखी सीख.




 





11 comments:

  1. Apratim ! Very well written. Keep it up.

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  2. nicely written!!
    Its a cruel world out there and when we think of them (beggers), its hard to make up our mind about our role in improving their condition.

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  3. are priyanka tumne poems likhni kab se suru ki mujhe to bas uma ka hi pata tha.........but very nice poem...tumne hi likhi hai na.....

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  4. thanks to all....
    yes vinay, i do write poems from a long time though the frequency of noting down is less..thanks for your encouragement..

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  5. Well nice written poem.
    TY ke chote chote poem ke mukhare ke baad bada poem.
    Ek Udaan ki ore...

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  6. great style to convey message!! :)
    Good one.

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  7. Priyanka, this is push button to get new poem. Process it further fast.

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  8. बहुत ही व्यंग्यपूर्ण तरीके से आपने आज के दौर को बयान किया है!
    बरबस कई पंक्तियों पर मुस्कराहट आ गयी!!

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