Monday, September 3, 2018

कुछ पंक्तियाँ ऐसे ही.... II


इस जबाब का सवाल कहीं खो गया है
हो सके तो दोबारा उठाना
कोशिशें तो कई चीज़ों की करी हैं आपने
हो सके तो फिर अपनी कलम को उठाना ......

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मैं तो निकली थी घर से तुम्हारे पास आने के लिए
पर मेरे कदम के दायरे उनके सवालों के दायरे से छोटे थे।
रस्ते के झींगुर और पपीहे से तो बचकर आ जाती 
पर उस भूरे काले बादल को मैं क्या मुँह दिखाती? 

मैं तो यही सोचती रही ..मुझे जाने ही क्यूँ दिया ,
रोक लिया होता उस दिन भी जैसे हर बार पकड़ के रोक लेते थे…. 
बस थोडा आनाकानी ही तो करती 
पर कुछ देर में मान ही जाती 

फिर तुम्हारे पास तो जलाने को सिगरेट भी थी,
 मेरे पास तो बस दिल था ....
वो तो कब का तुम्हें दे आई थी .....

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