Friday, August 7, 2015

मुखोटे


            ये कैसी मेरी भाषा है ये कैसी परिभाषा है
        क्यूँ मेरी हर निराशा में ये छिपी निरी आशा है
        क्यूँ जलने के बाद भी कोई ठंडक को न पाता है
         क्यूँ जीतने के बाद भी कोई हार ही को पाता है
    क्यूँ किसी अनजान में जान का अक्स नज़र आया है
      क्यूँ गिरने का भाव भी उस गिरी से लगता आया है
     क्यूँ होती है वो स-रिता फिर भी बहती चली आती है
        क्यूँ होता है जब सोना तब नींद ही न आती है
क्यूँ हिंसा के भीतर इन्सां दिखता है, क्यूँ दिखे है वानर में नर
क्यूँ दान में आन होना जरूरी है, क्यूँ जरी में भी दिखता है जर
     क्यूँ हम अपने वतन के वास्ते तन नत न कर पाते हैं
   सोचते हैं जीवन है क्या तो बस जीवों के वन को ही पाते हैं
     कैसा  है जगत प्रिया यहाँ मूल्यों के मूल इतने छोटे हैं
     कैसे ढूदे मानव यहाँ ओढ़े खड़े कितने मु-खोटे हैं  ...!!