Friday, July 31, 2015

बुद्धिजीवियों का खुदा

​हर नाइंसाफी के खिलाफ कदम उठाना ​यही सिखाया था न दुनिया का कायदा
पर काँप रहे थे दो हाथ जो सोच रहे थे कि उसे कलम थामना सिखाने का क्या हुआ फायदा 
वैसे तो मेरी इस कड़वी रचना का भी नहीं है कोई ख़ास फायदा
पर मेरी दो आँखें कल रात सोच रही थी कि चुपचाप नीर बहाने से भी नहीं कोई फायदा
तो चलिए मार्किट में एक नया खुदा लांच हुआ है …आइये वाकिफ होते हैं इन्से… ​


वो कागज़ के कई सफ़ेद चमकदार पन्नो को
घुमावदार नक्काशीदार अक्षरों से सजा रहा था
स्याही में सनी अपनी सुडौल उँगलियाँ से
मेज पर विजयी तबला बजा रहा था

वैसे क्या थी आज की विजय गाथा, शीर्षक था-
कैसे धर्म से भारत अधर्म के रस्ते को है जाता
हाँ वैसे उसे इस बात से दिक्कत नहीं
कि धर्म मौजूद है या नहीं
या फिर दुनिया में खुदा मौजूद है या नहीं

पर खुदा किस रंग या रूप का है ये बात पता करना ज़रूरी थी
अगर कोई सनसनीखेज - वंचित - पीड़ित - अबल खुदा को याद करे
और फिर भी ख़ुदा न सुने तो खुदा की ऐसी क्या मजबूरी थी..

पर एक मिनट ठहरो …… वो तो नास्तिकता के ख़याल को रखता था आबाद 
हाँ, इसलिए तो अब नास्तिकों के लिए नए धर्म को कर रहा है न इज़ाद
इस धर्म का पालन हर पढ़ा-लिखा बुद्धिजीव व्यक्ति करेगा
जो नहीं करेगा वो उसे कम अक्ल होने की उपाधि दे देगा
इस तरह वह अपनी कलम के बल से हर तरह के गरीब और हर प्रकार के दुखियारे की
बौद्धिक और भावनात्मक भूख को शांत करेगा .......
फिर वह साहसी, विद्वान,जुझारू और जागरूक कहलाएगा
बस एक बार यह नया धर्म चल जाए , बुद्धिजीवियों का खुद-आ भी कहलाएगा