Monday, August 26, 2013

बंटवारा

आज घर का बंटवारा करना था, बांटना था उन्हें अपना सारा सामान
पर सोच में खड़े थे दोनों , कैसे बँटता उनके सर के ऊपर का खुला आसमान ...
कैसे हिसाब होता कौनसी हँसी तेरी थी या थी मेरी
और कैसे लगता हिसाब की किसने किसके लिए कितनी नींदें थी वारी ..
कैसे बँटता वो वक़्त जिसकी अनमोल थी कीमत
और कैसे बँटता वो जहाँ जो दोनों की बाँहों में था सीमित
हाँ वैसे तो सारा सामान बँट चूका है बस कुछ बिखरे पल हैं बाकी
सोच में खड़े हैं दोनों , सर के ऊपर का खुला आसमान अब भी है बाकी .....