न जाने कितने बरसों से सूनी पड़ी थी उसकी फुलवारी
टूटा घर का सन्नाटा, उसके घर में भी गूंजी एक किलकारी
ओझल हो जाती चेहरे की शिकन, दूर हो जाती सब थकान
चेहरे पे जब भी देख लेती वो अपने प्यारे की मुस्कान
याद है उसे आज भी वो दिन जब उसकी ख़ुशी का कुछ ठिकाना था न रहा
अपनी प्यारी तोतली जबान में जब उसने पहली बार माँ था कहा
उसी माँ का हाथ थामे उसने अपना पहला कदम था बढाया
उसी माँ ने तो उस दुलारे को हाथ में कलम थामना था सिखाया
कितने बार टूटे होंगे क्रिकेट की गेंद से पड़ोसियों के खिडकियों के काँच
लेकिन सबसे लड़ लेती वो, न आने देती अपने बेटे पर कोई आँच
न जाने कितनी बार होमेवोर्क न होने पर उसकी कॉपी थी घर पर वापिस आई
काम क्यूँ नहीं करता तुम्हारा दुलारा शिक्षक ने मांगी थी सफाई
फिर कभी गलती न करना ये कसम भी तो थी उसी ने दिलाई
इसी शर्त पर तो ये बात दुलारे के पापा से थी छिपाई
यही सब याद करते छा जाती है उसकी आँखों में नमी
दुलारा हो चला है इंजीनियर उसे रही नहीं किसी बात की कमी
अपनी मर्ज़ी से उसने अपना नया परिवार है बसाया
अपनी काबिलियत से उसने शोहरत और नाम है कमाया
तरक्की ऐसी की सब दूना हो गया, घर भी एक के दो हो चले हैं
माँ के साथ एक छत के नीचे रहना ऐसे रुढ़िवादी विचार क्या लगते भले हैं !
घंटे घंटे फ़ोन के पास बैठी रहती वो, कभी तो बेटा फ़ोन करेगा
यूहीं दरवाजे के सौ चक्कर लगाती, कभी तो राह भूल यहाँ से गुजरेगा
इसी तरह कट रही थी उसकी अनगिनत सुबह और शाम
न कभी बेटा घर का रास्ता भूला, न ही कभी आया कोई पैगाम
एक रोज़ बेटे के पास किसी शुभचिंतक का फ़ोन था आया
माँ बीमार हैं तुम्हारी- मिल जाओ, ये संदेसा था भिजवाया
बेटा बुदबुदाया, 'न जाने माँ क्यूँ करती हैं फ़ोन बार बार
शायद पैसे चाहिए, ये सोच भिजवा दिए कुछ हज़ार
बेटा अनजान था, शायद इतनी लक्ष्मी तो माँ के घर में भी थी बरसती
लेकिन फिर भी उस माँ की आँखें अपने बेटे की एक झलक के लिए थी तरसती
बीत गए दिन बीते महीने पर उसे मिल न पाई इतनी फुरसत
कि कर आता पूरी अपनी माँ कि वो आखरी हसरत, आखरी हसरत !!