Sunday, January 29, 2012

चर्चा

                   
     आज शामू कि टपरी पर माहौल फिर था कुछ गरम
        राजनीति कि चर्चाएं छू रहीं थी अपना चरम
 देश में कितनी भुकमरी है , कितना बढ़ गया है भ्रष्टाचार ,
       इस देश में तो गरीबों का जीवन है बड़ा लाचार
सरकार भी कितनी उदासीन है, सिर्फ ताकत का है बोलबाला
चंद सिक्कों की खनक ने मनुष्य को कितना स्वार्थी है बना डाला

      इन्हीं चर्चाओं के शोर में कसक रही थी एक आह
     पास ही कि एक झोपडी में कोई भर रहा था कराह
  चटाई पर मैली सी चादर ओढ़े एक बुढ़िया थी सिमटी
   बुखार के कारण उसकी कुछ कपकपी थी न थमती
कुछ ही दूर पर उसकी बिटिया बैठी थी झुकाए अपना सर
   अपनी माँ की हर एक आह पर उठती थी वो सहर
    तेल की कुछ बूंदों ने उसे असमंजस में था डाला
  क्या वो जलाए उसमें घर का चूल्हा या वो करे उजाला
     घड़ी की टिक टिक पर कुछ और समय था बीता
   आंसू भी सूख चुके थे उसके, आँखें हो गई थीं रीता
    कुछ देर बाद उस झोपडी की ओर मुड़ी थी एक राह
लेकिन तब तक उस झोपडी में शांत हो चली थी वह आह

         शामू की टपरी में अब भी जारी थी चर्चा
कैसे उठाएगी वो अबला उस बुढ़िया के कफ़न का खर्चा ??