मद्धिम सा प्रकाश प्रज्ज्वलित कर रहा था एक राह
खिसकाई चटखनी तो दरवाजे ने ली एक ज़ोरदार कराह
कमरे का हर कोना एक सा प्रतीत होता था एक ही परत की वहां जमी थी धूल
ज़मीन पर बिखरे थे मुरझाये हुए कुछ गुलाब के फूल
उसकी लाइ हुई सुनहरी घड़ी का कुछ लग रहा था पुर्जा ढीला
काढ़ी हुई सफ़ेद चादर का रंग कुछ लग रहा था पीला
कोने पर फूटी पड़ी थी चूडियाँ और फर्श पर बिखरा था काजल
आँखों के सामने से गुजरने लगा मेरा बीता हुआ कल........
कुछ ही समय पहले तो शादी को समझने का मैंने किया था प्रयास
आई थी इस घर में गहनों से सजी, ओढ़े लाल लिबास
मेरे भी अनगिनत सपने थे, थे मेरे अनगिनत अरमान
चाहत थी ये पंख फैलाकर मैं भी भरूं ऊँची उड़ान
कुछ रोज पहले की ही तो बात है एक तिनका भी नहीं हिलता था मेरे बिना
अब तो चाहे दो जून की रोटी को तरस जाओ, बदले में मिलती है बस कुंठा और घृणा
कुछ रोज़ पहले की ही तो बात है सुबह भी मेरे भजन की गूंज से ही थी खनकती
मेरे माथे की बिंदी उस सूरज के प्रकाश से ज्यादा थी दमकती
अब तो मेरा मंदिर में जाना भी है निषेध,
भगवान भी इंसान हो गया है शायद...करने लगा है भेद!!
इससे पहले जब कोई मेरा हठ न हो पाता था पूरा
अपनी बात मनवाने के लिए मैं तो बहा देती थी आंसुओं की धारा
अब तो मेरा हर सपना मेरी आँखों के अन्धकार में ही है ढलता
मेरे इन आंसुओं से किसी एक का भी दिल नहीं है पिघलता ?
क्यूँ नहीं कूदने दिया मुझे उस आग में , मैं कम से कम सती तो कहलाती
ये श्वेत रंग की शांति मेरे नसीब तो न लिखी जाती
इस धुंधलके से बाहर झाँका तो लगा वक़्त बहुत तेजी से है गुज़र गया
मेरी खुशियों का खजाना किसी पिंजरे में कैद होकर ही रह गया
तोडूंगी ये पिंजरा मैं लूंगी उस पंछी से उसके पर मांग
दूर खड़ी उस चोटी से मैं भी लगाउंगी ऊँची छलांग
फिर होगी मेरे पैरों तले ज़मीन सर पे खुला आसमान
तोड़ दूंगी सारे बंधन मैं भी भरुंगी ऊँची उड़ान
कमरे का सन्नाटा बरकरार था पर मैंने ढूंढ़ ली थी अपनी राह
चटखनी लगाने से पहले फिर से आई एक ज़ोरदार कराह |