Wednesday, September 28, 2011

उड़ान


                    
मद्धिम सा प्रकाश प्रज्ज्वलित कर रहा था एक राह
खिसकाई चटखनी तो दरवाजे ने ली एक ज़ोरदार कराह
कमरे का हर कोना एक सा प्रतीत होता था एक ही परत की वहां जमी थी धूल
ज़मीन पर बिखरे थे  मुरझाये हुए कुछ गुलाब के फूल
उसकी लाइ हुई सुनहरी घड़ी का कुछ लग रहा था पुर्जा ढीला
काढ़ी हुई सफ़ेद चादर का रंग कुछ लग रहा था पीला
कोने पर फूटी पड़ी थी चूडियाँ और फर्श पर बिखरा था काजल
आँखों के सामने से गुजरने लगा मेरा बीता  हुआ कल........

कुछ ही समय पहले तो शादी को समझने का मैंने किया था प्रयास
आई थी इस घर में गहनों से सजी, ओढ़े लाल लिबास
मेरे भी अनगिनत सपने थे, थे मेरे अनगिनत अरमान
चाहत थी ये पंख फैलाकर मैं भी भरूं ऊँची उड़ान

कुछ रोज पहले की ही तो बात है एक तिनका भी नहीं हिलता था मेरे बिना
अब तो चाहे दो जून की रोटी को तरस जाओ, बदले में मिलती है बस कुंठा और घृणा
कुछ रोज़ पहले की ही तो बात है सुबह भी मेरे भजन की गूंज से ही थी खनकती
मेरे माथे की बिंदी उस सूरज के प्रकाश से ज्यादा थी दमकती
अब तो मेरा मंदिर में जाना भी है निषेध,
भगवान भी इंसान हो गया है शायद...करने लगा है भेद!!
इससे पहले जब कोई मेरा हठ न हो पाता था पूरा
अपनी बात मनवाने के लिए मैं तो बहा देती थी आंसुओं की धारा
अब तो मेरा हर सपना मेरी आँखों के अन्धकार में ही है ढलता
मेरे इन आंसुओं से किसी एक का भी दिल नहीं है पिघलता ?
क्यूँ नहीं कूदने दिया मुझे उस आग में , मैं कम से कम सती तो कहलाती
ये श्वेत रंग की शांति मेरे नसीब तो न लिखी जाती

इस धुंधलके से बाहर झाँका तो लगा वक़्त बहुत तेजी से है गुज़र गया
मेरी खुशियों का खजाना किसी पिंजरे में कैद होकर ही रह गया
तोडूंगी ये पिंजरा मैं लूंगी उस पंछी से उसके पर मांग
दूर खड़ी उस चोटी से मैं भी लगाउंगी ऊँची छलांग
फिर होगी मेरे पैरों तले ज़मीन सर पे खुला आसमान
तोड़ दूंगी सारे बंधन मैं भी भरुंगी ऊँची उड़ान
कमरे का सन्नाटा बरकरार था पर मैंने ढूंढ़ ली थी अपनी राह
चटखनी लगाने से पहले फिर से आई एक ज़ोरदार कराह |