Friday, July 1, 2011

श्रद्धा

क्या मौसम था तरोताजा; बेरोकटोक हवा चल रही थी 
घडी के कांटे  आठ बजा रहे थे पर अफ़सोस मेरी आँख नहीं  खुल रही थी..
लम्बे अरसे बाद मिला था ये सन्डे एकदम खाली 
बिस्तर छोड़ने की शर्त थी चाय की गरमागरम प्याली 

किन्तु परन्तु बंधू मेरे सपनों के महल में किसी ने घुसखोरी मचाई 
'तुरंत नहा धोकर तैयार हो जाओ' रसोई घर से तीखी घोषणा चली आई..
माँ की आज्ञा हो या हो विपक्ष का वार
ये दो हथियार कभी जाते नहीं बेकार...
'नहा धोकर तैयार हो गए हैं हम' जब हमने पहुंचा दिया सन्देश..
'मंदिर चलना है कुछ ही देर में ' हाई कमांड से आया आदेश 
अरे बिना अप्पोइन्त्मेन्त ये कृष्ण मुरारी ने हमारी पिक्चर का प्रोग्राम चौपट कर डाला
माँ के साथ संभाषण एकतरफा था, ये जान पहनी चप्पल और टंगा झोला .. 

मंदिर के बाहर जब चप्पल उतार के आँखों के समक्ष इतनी भीड़ नज़र आई
तब ये अप्पोइन्त्मेन्त का फायदा किसे ज्यादा होता ये बात बिजली की तरह दिमाग में कौन्धाई..
लेकिन इतनी सारी भीड़ देखकर मन में कुछ ख़ुशी रही थी जाग
हम अकेले महान नहीं थे' औरों ने भी किया था अपनी निद्रा का परित्याग!
हाथ में पूजा की थाली और सर पे दुपट्टा ओढ़ 
न जाने कितने श्रद्धालु खड़े थे अपने हाथों को जोड़..
अरे भीड़ से निकलकर माँ सीधे मेरी ओर चली आईं
आँख बंद कर प्रार्थना करो' ये कहकर थोड़ी सी डांट उन्होंने मुझे पिलाई 
हाथ जोड़कर हम भी उन श्रद्धालुओं की गिनती में हो गए शामिल 
आँखें मीचते ही सामने का दृश्य हो चला धूमिल...
 आँखें बंद कर घंटों खड़े होना, ऐसे मैं कैसे लगता मेरा मन
क्या आपके मुरारी जी प्रसन्न होंगे देखकर मेरे ये क्षण भर के जतन!
कुछ ही समय पश्चात मेरे कानों में गूंजी एक आवाज भारी भरकम
हम तो बहुत ही गलत थे हमारी इच्छाशक्ति में तो था बड़ा ही दम..

"प्रभु बोल रहे हैं हम ;कुछ चाहत हो तुम्हारी तो हमारे समक्ष रखो अपनी मांग
ऐसी दैविक ध्वनि सुनकर रह गए थे हतप्रभ ; सोचने लगे इतनी जल्दी क्या ले मांग...
फिलहाल के लिए तो मुझे बस दे दो एक छोटा सा वरदान
मंदिर के अहाते के श्रद्धालुओं के मन में है क्या - बस लेना है वही जान..
'तथास्तु ' कह वो आवाज हो गई उसी मूर्ति में विलोप 
तभी श्रध्हलुओं के तगादों का मेरे कानों पे  पड़ा प्रकोप..
कहीं अपने पास होने के लिए मुरारी जी से हो रही थी गुजारिश
तो कहीं कोई नौकरी मिलने के लिए कर रहा था मुरारी जी से सिफारिश
जहाँ नौकरी थी वहां तनख्वाह में बढ़ोतरी की थी गुहार
कहीं बढती हुई महंगाई को लेकर कोई लगा रहा था मुरारी जी को ही फटकार 
कहीं शादी की थी चिंता, तो कहीं शिकायत थी भुकमरी
कहीं कारण था घर के कलह झंझट, तो कहीं परेशानी थी बीमारी 

इन्ही कर्कश आवाजो में मेरे कानों में पड़ा कोई कोमल सा स्वर
इक नन्ही सी गुडिया की आवाज लग रही थी उस सारे शोर में मधुर 
उसे कल रात का भोजन हुआ था नसीब इस बात के लिए थी वो शुक्रगुज़ार
उसकी बीमार माँ आज भी जिंदा है इस बात के लिए वो करती नमन बार बार
घर से स्कूल तक सभी प्रियजनों के लिए कर रही थी वो प्रार्थना 
सभी के स्वास्थ और खुशियों की थी उसमें मंगल कामना..
कक्षा में प्रथम आने का मुरारी जी को धन्यवाद वो दे रही थी अपार
उसकी प्रार्थना के हर शब्द में व्यक्त होता केवल आभार..

सभी आवाजों के बीच भी गया था ये कोमल स्वर मेरे मन को भेद
मंदिर आने का मेरे मन में नहीं रह गया था कोई खेद..
हम सबके पास शिकायत करने के लिए कभी भी वक़्त की होती नहीं कमी
लेकिन उस '(अ) बोध बालिका 'की प्रार्थना सुन मेरे आँखों में आ गई कुछ नमी
मुरारी जी के साथ का उसका संभाषण कुछ और सुनने में मिलता इतने में माँ की कोहनी मुझसे टकराई
 वापिस घर नहीं चलना ये कहते हुए वो जरा सा मुस्कुराई 

आँखें खोली तो मंदिर में अब भी भीड़ थी और बरकरार था लोगों का कोलाहल
मूर्ति की तरफ झट से नज़र घुमाई तो देखा मुरारी जी खड़े थे मुस्कुराते हुए बिलकुल अचल!