ये कैसा आभास है, ये कैसा आभास है
सागर से नजदीकियां हैं फिर भी क्यूँ प्यास है?
ये कैसा आभास है, ये कैसा आभास है
धुंधली सी नज़र है, एक छवि ओढ़े लिबास है
मुड़ती सी सड़क है, उसके लौट आने की आस है
ये कैसा आभास है, ये कैसा आभास है
उस चकोर को हरदम अपने चाँद की तलाश है
उस मयूर को भी तो बस मेघा के बूंदों की प्यास है
फिर मुझे ही क्यूँ अकेला रहना रास है?
ये कैसा आभास है, ये कैसा आभास है
गुज़रा वक़्त नहीं लौटता इसका विश्वास है
भूलने की चाहत है पर यादें कुछ ख़ास हैं
बहती हवा में मुझे उसकी महक का एहसास है
ये कैसा आभास है , ये कैसा आभास है.