किनारे पे खड़े उस मुसाफिर को अब किसी कश्ती की क्या जरूरत?
उस बहादुर जाबाज़ को किसी तिनके के सहारे की क्या जरूरत?
जिसके पास हो पूरा आफताब उसे किसी शमा की क्या जरूरत?
आप चुनते हैं मंजिल जो अपनी उन्हें रास्ते दिखाने की क्या जरूरत?
उस महकते हुए खुशनुमा चमन को किसी पतझड़ से डरने की क्या जरूरत?
जिसके पास हो हज़ारों का प्यार उसे किसी मामूली दुआ की क्या ज़रुरत?
वक़्त तो बदलता ही रहता है ये तो है वक़्त की जरूरत
फिर क्यूँ आते हैं सवालिया निशाँ जब भी आता है ये अलफ़ाज़ जरूरत.
बदलते वक़्त में उस मुसाफिर को कभी तो उस पार जाना होगा,
तब उसे अपने लिए उस कश्ती को ही बुलाना होगा.
बदलते वक़्त में जाबाज़ भी तुफानो में घिर सकता है,
तभी कोई तिनका उसके डूबते वक़्त में उसका सहारा बन सकता है.
बदलते वक़्त में ये शमा ही तुम्हारे करीब होगी
ढलती शाम में तुम्हारे रोशन जहाँ का नसीब होगी.
बदलते वक़्त में क्या पता कोई नशा तुम्हारी मंजिल धुंधली कर जाये
तब किसी की ऊँगली ही तुम्हें सही रास्ते पे ले आये.
बदलते वक़्त में नए फूलों को भी तो खिलना होगा,
इसलिए पतझड़ के मौसम को चमन में आना ही होगा.
वक़्त बदले न बदले क्या तुमने जाना है क्या है वो मामूली दुआ,
तुम ही सोचो तुम्हें हज़ारों का प्यार कैसे नसीब हुआ.
न देना कोई नारा न ही देनी कोई नसीहत
हर कोई तलबगार है यहाँ हर किसी की है कुछ जरूरत
इसलिए ऊपरवाले से करनी है बस इतनी सी इबादत
बदले चाहे वक़्त पर न बदले इंसानी फितरत.