Sunday, December 19, 2010

​ फ़र्ज़



वैसे तो वे किस्मत के बड़े धनी थे,
अखबार में मचाते हर रोज़ सनसनी थे.
कॉलेज में मन लगाकर जो सीखा था कायदा,
लगता है पूरे शहर में सबसे ज्यादा इन्हें ही हुआ था फायदा.
बड़ा सा बंगला और उसके सामने चौड़ा सा अहाता
एक से एक बढ़िया गाड़ियों का लगा रहता था ताँता
कानून के दांव पेंच में ऐसे माहिर कि जब भी देते थे दलील
सामने वाले की छुट्टी हो जाये, ऐसे मशहूर थे ये वकील.

एक दिन एक बूढा रोज़मर्रा के काम से अपने घर से क्या निकला,
किसी मनचले की गाड़ी ने बिचारे को जा कुचला. 
अब इस मनचले पर समस्या कुछ भारी थी,
अगले ही महीने तो इसपर चुनाव की ज़िम्मेदारी थी.
अब इस समस्या कि घड़ी में किसका दरवाजा खटखटाए
अरे शहर के इन नामी वकील से बेहतर क्या होगा कोई उपाय
और इनकी किताब में तो पहले से ही दर्ज था-
जिसकी बड़ी आय,
उसीको मिलेगा न्याय!!

तो फिर केस की सुनवाई जो शुरू हुई तो सरकारी वकील की भी गल न पाई दाल
वकील साहब ने ऐसे दांव पेंच खेले कि कोर्ट में आ गया भूचाल
अंत में साबित कर दिया कि ये तो था एक्सिडेंट का केस
बूढ़े को बना दिया अँधा, मिट ही गया क्लेश
केस की जीत से वकील साहब की थम नहीं रही थी मुस्कान
तभी भीड़ में से निकलकर आया एक व्यक्ति अनजान
बोला 'जीते जी तो तू उसे दे न पाया कोई सुकून
उस दिन उस गाडी के नीचे हुआ था तेरे ही बाप का खून
यूँ तो वो उसी दिन मर गया था जब तू उसे छोड़कर था आया
आज तूने सही मायने में उसे दफनाकर अपने बेटे होने का फ़र्ज़ है निभाया !!!'

Sunday, October 3, 2010

​ आभास



                      ये कैसा आभास है, ये कैसा आभास है
                    सागर से नजदीकियां हैं फिर भी क्यूँ प्यास है?
                       ये कैसा आभास है, ये कैसा आभास है

धुंधली सी नज़र है, एक छवि ओढ़े लिबास है
मुड़ती सी सड़क है, उसके लौट आने की आस है
ये कैसा आभास है, ये कैसा आभास है

                     उस चकोर को हरदम अपने चाँद की तलाश है
                    उस मयूर को भी तो बस मेघा के बूंदों की प्यास है
                           फिर मुझे ही क्यूँ अकेला रहना रास है?
                           ये कैसा आभास है, ये कैसा आभास है

गुज़रा वक़्त नहीं लौटता इसका विश्वास है
भूलने की चाहत है पर यादें कुछ ख़ास हैं
बहती हवा में मुझे उसकी महक का एहसास है
ये कैसा आभास है , ये कैसा आभास है.

Thursday, September 23, 2010

फितरत

                           किनारे पे खड़े उस मुसाफिर को अब किसी कश्ती की क्या जरूरत?
                            उस बहादुर जाबाज़ को किसी तिनके के सहारे की क्या जरूरत?
                             जिसके पास हो पूरा आफताब उसे किसी शमा की क्या जरूरत?
                          आप चुनते हैं मंजिल जो अपनी उन्हें रास्ते दिखाने  की क्या जरूरत?
                      उस महकते  हुए खुशनुमा चमन को किसी पतझड़ से डरने की क्या जरूरत?
                      जिसके पास हो हज़ारों का प्यार उसे किसी मामूली  दुआ की क्या ज़रुरत?

                                    वक़्त तो बदलता ही रहता है ये तो है वक़्त की जरूरत
                          फिर क्यूँ आते हैं सवालिया निशाँ जब भी आता है ये अलफ़ाज़ जरूरत.


                             बदलते वक़्त में उस मुसाफिर को कभी तो उस पार जाना होगा,
                                    तब उसे अपने लिए उस कश्ती को ही बुलाना होगा.


                                  बदलते वक़्त में जाबाज़ भी तुफानो में घिर सकता है,
                       तभी कोई तिनका उसके डूबते वक़्त में उसका सहारा बन सकता है.


                                      बदलते वक़्त में ये शमा ही तुम्हारे करीब होगी
                                   ढलती शाम में तुम्हारे रोशन जहाँ का नसीब होगी.


                        बदलते वक़्त में क्या पता कोई नशा तुम्हारी मंजिल धुंधली कर जाये
                                  तब किसी की ऊँगली ही तुम्हें सही रास्ते पे ले आये.


                                    बदलते वक़्त में नए फूलों को भी तो खिलना होगा,
                                  इसलिए पतझड़ के मौसम को चमन में आना ही होगा.


                              वक़्त बदले न बदले क्या तुमने जाना है क्या है वो मामूली दुआ,
                                    तुम ही सोचो तुम्हें हज़ारों का प्यार कैसे नसीब हुआ.


                                         न देना कोई नारा न ही देनी कोई नसीहत
                                  हर कोई तलबगार है यहाँ हर किसी की है कुछ जरूरत
                                  इसलिए ऊपरवाले से करनी है बस इतनी सी इबादत
                                         बदले चाहे वक़्त पर न बदले इंसानी फितरत.

Monday, August 16, 2010

​ अंतर


बारिशें तब भी होती थीं , बारिशें अब भी होती हैं
पर इनमे दिखता है बस थोड़ा सा अंतर
तब भीगता था धरती का हर कोना
अब बस मेरी पलकें हो जाती हैं तर

                    रातें तब भी सूरज के ढलने से होती थीं, रातें होतीं है जैसे अब
                    पर इनमे दिखता है बस थोडा सा अंतर
                    तब पलक झपकाते ही सुबह होती थी
                   अब ये कुछ लम्बी हो गयीं है, पाती नहीं गुज़र

होली तब भी तो खेलते थे, होली अब भी खेलते हैं
पर इनमे दिखता है बस थोडा सा अंतर
तब हर रंग का बराबर योगदान होता था सजाने में
अब तो बस लाल का ही दिखता है असर

                   दिवाली तब भी होती थी और दिवाली अब भी होती है
                   पर इनमे दिखता है बस थोडा सा अंतर
                   तब हर घर में पटाखे- बम जलते थे
                  अब इन बमों से जलते हैं घर !!

Monday, May 10, 2010

ताजमहल

गूंजती हर धड़कन, मन छेड़े है कोई साज़
आँखों में उतरती ये तस्वीर ये है 'भारत का ताज'
दशकों से खड़ी आगरा में सुंदरता की ये बेमिसाल निशानी
इसके पीछे छिपी है दो प्रेमियों की ऐतिहासिक कहानी...

सोने की चिड़िया था जो देश, एक बादशाह की हुकूमत थी वहां
बेगम थी उसकी मुमताज और बादशाह का नाम था शाहजहाँ
चौदहवीं संतान के जन्म में मुमताज ने अपनी जान थी गवाईं
पर चाहकर भी अपनी प्रिय बेगम की याद बादशाह को न बिसराई
अपनी चहेती बेगम की बादशाह को बनवानी थी मज़ार
ऐसी मज़ार जो पूरी दुनिया में रहे यादगार..

इस मज़ार के हर पत्थर को तराशा जाये ऐसी थी शहंशाह की थी ख्वाइश
कुछ बीस हज़ार कारीगरों ने इसे बनाने में लगाये साल बाईस
देश विदेश से कीमती रत्नों के मंगाए अट्ठाईस प्रकार
चार मीनारों के कन्धों में सजी अमरुद गुम्बज ने बढाया ताजमहल का निखार
इस मज़ार को बनाने में लगा बीस हज़ार हाथियों का साथ
और बादशाह ने उस जमाने में लगाई साढ़े तीन करोड़ की लागात
सन १६४३ में हुआ पूरा इस मज़ार का निर्माण
ताजमहल के नाम से आठ अजूबों में एक करे ये भारत की ऊंची शान .